काव्य भाषा : उपालंभ -पंकज मिश्रा “निश्छल” रीवा

Email

—–उपालंभ—–

तू मशरूफ है तो रह तेरी दुनिया में
हम न तब थे , न हैं अब तेरी दुनिया में

मुझे खलती है कमी तेरी, तुझे मगर नहीं
जो चाहिये तुझे , है सब तेरी दुनिया में

न मेरे तो किसी के भी साथ सही
तुझे सलामत रखे रब तेरी दुनिया में

मैं इक आईना था जो ठोकरों से टूट गया
तुझे कोई ठोकर न लगे अब तेरी दुनिया में

हमें तो आता है दरिया ए अश्क में तैरना
रोने का ना हो कोई सबब तेरी दुनिया में
*****

पंकज मिश्रा “निश्छल”
रीवा, मध्यप्रदेश

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here