‘बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा’ पहली डांट -डॉ. वर्षा सिंह,सागर

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

पहली डांट
-डॉ. वर्षा सिंह

सुबह अख़बार पढ़ते समय अंदर के पृष्ठ पर अचानक मेरी नज़र आख़िरी कॉलम के कोने में प्रकाशित उस सूचना पर पड़ गई जिसमें सूचनाकर्ता के हवाले से लिखा था कि फलां आवारागर्द शख़्स सूचनाकर्ता व्यक्ति का बेटा है जिसका अब सूचनाकर्ता से किसी तरह का कोई भी संबंध नहीं है। यूं तो अख़बारों में इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित होना कोई ख़ास बात नहीं है, लेकिन कहीं किसी ख़बर से को-रिलेट इस सूचना ने मेरे चिंतन के दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक दे दी।
अक्सर ऐसा होता है कि बिगड़ी औलाद के माता-पिता को इस तरह का कठोर क़दम उठाने पर मज़बूर हो जाना पड़ता है। परिस्थितियां इस तरह निर्मित हो जाती हैं कि अपने ज़िगर के टुकड़े, अपनी सगी औलाद से उन्हें सारे रिश्ते ख़त्म करने के लिए मज़बूर हो जाना पड़ता है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों के निर्मित होने के लिए ज़िम्मेदार आख़िर कौन होता है ? क्या वे बिगड़ैल आवारागर्द बच्चे या स्वयं माता-पिता ?
गहराई और गम्भीरता से यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो यह तथ्य सामने आता है कि कहीं न कहीं इस सबके लिए पेरेंट्स यानी बच्चे के माता – पिता ही ज़िम्मेदार रहते हैं। यह कहा जाता है कि किसी भी बच्चे की पहली पाठशाला, उसका अपना घर ही होता है और पहली शिक्षिका उसकी अपनी मां होती है।
इस संदर्भ में मुझे याद आ रही है मेरी अनुजा डॉ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा लिखी “भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं” पुस्तक में भील आदिवासियों के मध्य प्रचलित एक कथा… इस कथा का मुख्य पात्र सानक बचपन में कहीं जाता तो चोरी से वहां की कोई न कोई चीज़ उठा लाता। उसकी मां उस चोरी की हुई चीज़ को देख कर सानक को डांटने के बजाए शाबाशी देती और इसी तरह चीज़ें चुरा कर लाने के लिए प्रोत्साहित करती। सानक जब युवा हुआ तो एक दिन उसने सेठ के घर चोरी करने का निश्चय किया। सेठ के घर से कीमती सामान चुरा कर सानक जब भागने का प्रयास कर रहा था, तभी चौकीदार ने उसे देख लिया। घबराहट में सानक ने वहां रखी वज़नदार सुराही चौकीदार के सिर पर दे मारी, जिससे चौकीदार का सिर फूट गया और उसकी मृत्यु हो गई। सानक पकड़ा गया। उसे चोरी के साथ ही हत्या का भी दोषी पाया गया। सानक को मृत्युदंड की सज़ा सुना दी गई। जब फांसी दिए जाने के पूर्व सानक से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो सानक ने अपनी मां से मिलने की इच्छा प्रकट की। मां बेटे से मिलने आई तो उसे फांसी के फंदे के पास देख कर फूट-फूट कर रोने लगी। तब सानक ने मां से कहा- “अरे, तुम क्यों रो रही हो ? यह तो तुम्हारी ही दी हुई शिक्षा और प्रोत्साहन का नतीज़ा है। तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए।”
मां यह सुन कर सन्न रह गई। सचमुच असली अपराधी तो वह स्वयं है। वह रोते हुए न्यायाधीश से प्रार्थना करने लगी कि सानक को चूंकि उसने ही चोरी करने के लिए प्रोत्साहित किया था अतः फांसी की सज़ा सानक के बदले उसे दे दी जाए। न्यायाधीश समझ गए कि मां-बेटे दोंनों की आंखें खुल गई हैं तो उन्होंने सानक की फांसी की सज़ा को बदल कर मां- बेटे को जीवन भर मृतक चौकीदार के आश्रितों की सेवा करने की सज़ा सुना दी।
इस कहानी का भी यही निष्कर्ष है कि यदि मां ने बचपन में की गई पहली चोरी के लिए अपने पुत्र को डांट दिया होता और उसे प्रोत्साहित करने के बजाए भविष्य में चोरी न करने के लिए समझाया होता तो पुत्र चोरी और फिर हत्या जैसा अपराध कभी नहीं करता।
… और इस प्रसंग से तो सभी परिचित होंगे कि महात्मा गांधी जब अपनी युवावस्था में उच्च शिक्षा प्राप्त करने विदेश जाने लगे तो उस समय महात्मा गांधी की माता पुतली बाई ने उन्हें शपथ दिलाई थी कि – ‘बेटा, तुम मेरे सामने प्रतिज्ञा करो कि मै मांस नहीं खाऊंगा, मदिरा नहीं पीऊंगा और कुसंगति में पड़कर गलत मार्ग नहीं अपनाऊंगा।’ महात्मा गांधी द्वारा यह शपथ लेने के बाद ही उनकी माता ने उन्हें विदेश जाने की आज्ञा दी थी। जिसे उन्होंने आजीवन निभाया भी। मुद्दे की बात यह है कि बचपन में मिली शिक्षा मनुष्य को श्रेष्ठ भी बना सकती है और एक अपराधी के रूप में उसे एनकाउंटर की गोली के सामने भी पहुंचा सकती है। यह निर्भर करता है कि बचपन में उसे कैसी शिक्षा दी गई। उसके पहले गलत कदम पर रोक लगाई गई या नहीं।
और अंत में मेरी ये काव्य पंक्तियां….
मैं हूं कच्ची मिट्टी, माता ! जैसा चाहो ढालो ।
देव बना लो चाहे मुझको, दानव मुझे बना लो।
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सागर, मध्यप्रदेश ।

4 COMMENTS

    • जीवन में संस्कारों का अंकुश होना बहुत ज़रूरी है। ये संस्कार माता-पिता की डांट के रूप में ही सबसे बुनियादीतौर पर मिलते हैं। बिगड़ी हुई संतानों के माता-पिता स्वयं को क्लीन चिट नहीं दे सकते हैं।
      उम्दा लेख के लिए पुनः बधाई 🙏

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