लघुकथा : सिक्का एक रुपए का – विपिन पवार,मुंबई

Email

लघुकथा

सिक्का एक रुपए का
– विपिन पवार

उस दिन पुणे स्टेशन से 11:40 की मुंबई-बेंगलुरु उद्यान एक्सप्रेस पकड़ने के लिए घंटा-डेढ़-घंटा पहले ही सिटी बस से ससून अस्पताल के सामने उतर गया । स्टेशन इमारत की ओर जाते समय टैक्सी स्टैंड पर एक हट्टा- कट्टा भिखारी ठीक रास्ता रोकने की मुद्रा में हाथ फैलाकर खड़ा हो गया।
‘भगवान के नाम पर कुछ दे दो, बाबूजी, रुपया दो रुपया, आपकी मुरादें पूरी हो जाएगी।‘ गुस्सा तो बहुत आया, ऊं…. हूं… साले, ये भगवान के एजेंट। पर इतना कहकर पीछा छुड़ाना चाहा कि-
‘हट्टे कट्टे हो, कुछ कामधाम क्यों नहीं करते ?’ बाबूजी रुपया दो रुपया भीख मांग रहा हूं। सुबह से पेट में अन्न का दाना नहीं है। आपकी सलाह से तो पेट भरने से रहा। देना है तो भगवान के नाम पर भीख दे दो, सलाह नहीं। लाचारी लेकिन रोष मिश्रित दंभभरी आवाज अपनी पीठ पीछे छोड़ता हुआ मैं आगे चल पड़ा। पोर्च के अंदर घुसते ही रेलटेल साइबर एक्सप्रेस के सामने खड़े-खड़े याद आया कि अरे ! मोबाइल तो कमरे पर ही रह गया। अब आठ-दस किलोमीटर कमरे पर विमान नगर जाने और लौटकर उद्यान एक्सप्रेस पकड़ने का समय तो था नहीं। और गाड़ी छोड़ने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था, क्योंकि कल बेंगलुरु पहुंच कर दिनभर ऑफिस का काम कर वापसी में फिर गाड़ी पकड़ना था। परसों की मीटिंग में न रहने का अर्थ है कि मेरी प्रोजेक्ट पर की गई 15 दिनों की मेहनत पर पानी फिरना और वाहवाही वर्मा को मिलना। बाकी तो कल बेंगलुरु पहुंचकर ऑफिस से सारे कॉल कर ही लूंगा। वर्मा को एक बताना रह गया कि बाइंडिंग एकदम बढ़िया होनी चाहिए। लपककर पीसीओ के कॉइन बॉक्स की ओर बढ़ा। पर्स टटोला तो उसमें एक रुपए के सिक्के के अलावा सब कुछ था। सारी जेबें टटोली लेकिन सिक्काब नहीं मिला। पांच का सिक्कार हाथ में लिए रेल टेल वालों, आसपास खड़े यात्रियों, हॉकरों, जीआरपी के सिपाहियों आदि से पैसों की मांग की, पर शायद वह दिन ऐसा था कि लक्ष्मीजी ने एक रुपए के सारे सिक्के बैन कर अपनी तिजोरी पर ताला लगा दिया था।
हारकर पोर्च से बाहर निकलते समय सोचा कि अब तो 11:30 हो रहे हैं, सड़क पार कर सिगरेट लूं, तो कहीं उद्यान न छूट जाए। कशमकश में खड़ा ही था कि पीछे से आवाज आई-
‘ भगवान के नाम पर कुछ दे दो, बाबूजी…. रुपया दो रुपया …….. आपकी मुरादें…….’
पलटा तो वही हट्टा कट्टा भगवान का एजेंट, दंभी भिखारी। मेरी मुट्ठी में बंद पांच का सिक्का……. एक रुपए की जरूरत…… मैंने आवाज में नकली मिठास घोलते हुए जल्दी से कहा कि
‘बाबा छुट्टा नहीं है’
शायद भगवान ने भिखारियों को मुट्ठी में बंद पैसों का सही पता लगाने का मंत्र दे दिया है। उसने तपाक से कहा –
‘बाबूजी दो तीन रुपए तो दे दो। सुबह से भूखा हूं।‘
मैंने तपाक से पांच का सिक्का उसके कटोरे में डाला और एक-एक के 2 सिक्के उठा लिए और बिना उसकी और देखे प्लेटफार्म नंबर एक का रुख किया ही था कि पीछे से आती आवाज को न सुनना मेरे बस में नहीं था
बाबूजी ! भगवान सबकी जरूरतें पूरी करता है……. भले ही वह पेट की हो या सेठ की।
उप महाप्रबंधक (राजभाषा),
मध्य रेल मुख्यालय,
मुंबई

4 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर लघुकथा। महत्व सबका होता है, बस समय की बात है।

    • वाह पवार सर! रोजमर्रा की ज़िंदगी में घटने वाली ऐसी छोटी सी घटना को क्या खूबसूरती से आपने एक लघुकथा में बांधा है। कौन किस वक़्त जाने कैसे काम आ जाए कुछ कहां नही जा सकता। वक्त और इंसान (बड़ा-छोटा) दोनों का महत्व इस कथा में समाया है। आपकी आगामी रचनाओं के लिए शुभकामनाएं।

  2. बहुत खूब, लघुकथा : सिक्का एक रुपये का ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here