काव्य भाषा : निगाहें – अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।

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ग़ज़ल
निगाहें

(1)
निगाहें यार होती है, बड़ी दिलदार होती है।
किसीसे लड़गई यारों, निगाहें चार होती है।।
(2)
रहें चौकस जमाने में, कहाँ कोई गिला इससे,
निभाती साथ ये सबका, नहीं बेकार होती है।
(3)
समाजाती जिगर में ये, लुभाती है जमानें को,
सभी कायल हुए इसके, निगाहें प्यार होती है।
(4)
निगाहें जब रचे कजरा, गुले गुलजार होती है,
जरासी ये भड़क जाये, कटारी धार होती है।
(5)
सदा आगाह करती है, गजब अंगार होती है,
निगाहें अड़ गई जानों, जिगर के पार होती है।
(6)
बहुत ये धीर होती है, जरा गंभीर होती है।
कभी ये जीत होती है, कभी ये हार होती है।
(7)
वक्त के साथ ये चलती, नहीं लाचार होती है।
निगाहों पर भरोसा कर, बड़ी रसदार होती है।
(8)
किसीसे पूछले चलके, जरूरत क्या निगाहों की,
सभी कहते नगीना है, बड़ी दरकार होती है।
(9)
बड़ी नायाब नजराना, खुदा ‘अनि’ को नवाजे है।
निगाहों की हिफाजत कर, बहुत साकार होती है।

स्वरचित
अनिरुद्ध कुमार सिंह,
धनबाद, झारखंड।

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