काव्य भाषा : ग़ज़ल – श्लेष चन्द्राकर, महासमुंद

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ग़ज़ल

वो देके गाली बुला रहा था
तमीज़ ऐसे सिखा रहा था

कही है मैंने बता रहा था
ग़ज़ल किसी की सुना रहा था

उजाड़ कर मुफलिसों की बस्ती
शोरूम अपना बना रहा था

लगाने वाला सभी पे तोहमत
शरीफ़ है खुद जता रहा था

सुना के झूठी वो फिर कहानी
अवाम को बरगला रहा था

जवाब देना पड़े न उसको
सवाल से डरके जा रहा था

रखी किसी ने जो श्लेष माँगे
तो झुनझुना वो थमा रहा था

श्लेष चन्द्राकर,
पता:- खैरा बाड़ा, गुड़रु पारा, वार्ड नं.- 27,
महासमुन्द (छत्तीसगढ़) पिन – 493445,
मो.नं. 9926744445

2 COMMENTS

  1. बहुत अच्छे। वाह वाह श्लेष जी। लाजबाब।

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