समीक्षा : मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का पुलक है अनुभूति सृजन -प्रतिमा त्रिपाठी राँची झारखण्ड

समीक्षा : मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का पुलक है अनुभूति सृजन

संगीता सहाय ‘अनुभूति’ की कृति “अनुभूति सृजन” वास्तव में मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का पुलक है। काव्य जगत में संगीता की लेखिनी किसी परिचय की मोहताज नही।
उन्होंने अपनी लेखिनी के माध्यम से अपना परिचय बखूबी एक संवेदनशील, प्रखर, विप्लवी कवियत्री के रूप में करा दिया है। उनकी कविता हृदय की उथलपुथल की सच्ची अभियक्ति है।
कविता शाब्दिक स्तर पर मौन ही होती है। परंतु भाव भंगिमा के भाषिक स्वर ध्वनित होते ही है। मुखर हो उठती है। संगीता की रचनाओं का संसार बहुत फैलाव लिए है। वो कही रुकता प्रतीत नही होता है। उनकी लेखिनी हर बिषय को स्पर्श करके गुजरी है। उनका ये संग्रह “अनुभूति सृजन” उनका प्रथम रचनात्मक हस्ताक्षर है। जो विभिन्न बिषयों को समेटे हुए उनकी कल्पनाशीलता से परिचय कराता है। ये संग्रह किसी एक बिषय को केंद्र-बिंदु मानकर नही रच गया है। यही कवियत्री की विशेषता है कि उन्होंने प्रत्येक बिषय और शीर्षक से तारतम्यता जोड़ते हुए कविता की रागात्मक अनुभूति को बनाये रखी। जिससे यह संग्रह अपने शीर्षक नाम के साथ पूरी तरह न्याय करता है।

वैसे तो उनकी रचनायें हमसे अक्सर रूबरू होती है। कभी चुलबुली बन चौकाती है, कभी एक परिपक्व स्त्री के मनोभाव से मिलाती है। जो अपने भीतर पृथ्वी जैसी सहनशीलता धरते हुए जगत व्यवहार में तल्लीन रहती है। एक माँ, एक बेटी, प्रेयसी पत्नी कई रूप धर उनकी कविताएं आपसे मिलने आएगी। कभी जूही की फूल जैसी कमनीय तो मोंगरा की सुगंध से सरोबर करती हुयी। कही वेदना का प्रस्फुटन अंकुरित होते भांवों के अंकुर रूप में और कही कोई चुभता प्रश्न हमारे अंतर में छोड़ जाती है। जिससे पाठक सीधे सीधे मंथन की शरण मे चला जाता है। प्रस्तुत है उनकी कविताओं के कुछ वैसे अंश जो मन को आंदोलित करने से नही चूकते और विवश कर देते है, आत्ममंथन के लिए।
उनकी कविता ‘आत्मा’ से गूंजता चीत्कार….

अरे तू तो एक विशुद्ध आत्मा है
वो सकपकायी और बोली हड़बड़ाई
हाँ मैं एक आत्मा हूँ मगर शुद्ध कहाँ
मलिनता रहित हूँ मगर बुद्ध कहाँ।
सुन मेरी व्यथा तू विचलित ना होना
तन सहित नोची और खसोटी गई
गोश्त रूप में मेरी बोटी बोटी
उन बहशी दरिंदो को परोसी गयी।

इतना ही इस कविता की कुछ पँक्तियाँ तो पत्थर हृदय को भी पिघलने पर विवश कर दे।
आज की मसालेदार अखबा हुयी मैं
घृणित नज़रों की शिकार हुई मैं।
वही परवरिश कविता में भविष्य को सवारने को आतुर
एक माँ अपने माता पिता द्वारे पाये संस्कार को मोतियों के जैसे पिरोती है अपने बच्चों की जीवन माला में।

संस्कार परवरिश का मर्म समझने लगी हूँ।

वही उनकी कविता ‘मकड़जाल’ में स्त्री की प्रतिदिन की जद्दोजहद और जिम्मेदारी, नाते रिश्ते कर्तव्य की बलि वेदी पर अक्सर स्त्री के ही सपनें आहूत होते है। इस कविता में स्त्री द्वंद और मकड़जाल के चक्रव्यूह को भेदती उसकी जिजीवषा साफ परिलक्षित होती है।

दृग मूंदे नेत्र सजल
बहती अश्रु की अविरल धारा
कहती है सिसकियां
कौन सुनेगा मौन यहाँ।

स्त्री जीवन की तमाम जटिलताओं को रेखांकित करती हुयी तस्वीर पेश करती है। मौन के पाषाड़ से अपनी कोमल इच्छाओँ को दबाकर बहुत सहजता से कर्म व्यवहार में जुट जाती है। परंतु उसके हृदय की मौन को समझने वाला यहाँ कोई नही है।

‘अंकुर’ कविता में कवियत्री का देश प्रेम और अपने देश के सैनिकों के प्रति सम्मान मुखर हो उठता है। उनकी इन पंक्तियों से सहज ही समझा जा सकता है कि अंकुर को बिम्ब बनाकर कवियत्री क्या कहना चाहती है।

पल्लवित पुष्पित होकर
सहकर मौसम के थपेड़ों को
पाषाण हुआ वो अंकुर
इस जगत में जीवित रहने को

इस कविता में कवियत्री के कोमल संवेदनशील भाव बहुत सहज ही उभर कर आते है।
इसके इतर इनकी बहुतेरी कविताएं है जो मन को धीरे से सहलाकर तो कई झझोड़कर चली जाती है। या “अनुभूति सृजन” कवियत्री की प्रथम संग्रह होते हुए भी परिपक्व लेखिनी की झलक दे जाता है। आशा है आप सभी का स्नेह और प्रेम कवियत्री और उनकी रचना संसार पर प्रसंशा के पुष्प अवश्य बरसायेगा। बहुत ही सुंदर सहज और सरल पठनीय संग्रह है।

प्रतिमा त्रिपाठी
राँची झारखण्ड।

1 COMMENT

  1. सादर आभार युवा प्रवर्तक 🙏
    मेरी पुस्तक समीक्षा को बेबसाइट पर प्रकाशित करने हेतु सहृदय धन्यवाद आदरणीय देवेन्द्र सोनी सर 🙏

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