काव्य भाषा : आ रही है – डॉ.अखिलेश्वर तिवारी पटना

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आ रही है

फ़िज़ाओं से तेरी खुशबू आज आ रही है।
लगता है जैसे तुम मेरे पास आ रही है।
पता था तोड़ दोगी कफ़स को एक दिन।
ओ देखो मेरे दोस्तों मेरी जान आ रही है।

तुझे देखकर कायनात भी खिलखिला रही है।
तुझे अपनी गुलिस्ताँ का गुल बता रही है।
बहुत नाज है उसको तेरे जीनत पर।
धिरे धीरे ओ अपने आप पर इतरा रही है।

भौरों के साथ मिलकर वो गुनगुना रही है।
उसका कहना है की कोहिनूर आ रही है।
फलक पर बिजलियाँ तुझसे शरमा जारहीं है।
नवजवानों के मुख से केवल आह आ रही है।

डॉ.अखिलेश्वर तिवारी
पटना

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