विविध : हिंदी फिल्‍मों की जान है हमारी रेल -विपिन पवार,मुम्बई

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लेख
हिंदी फिल्मों की जान है हमारी रेल
– विपिन पवार

सन 1960 में देवानंद की एक फिल्म आई थी ‘काला बाजार’ जो बहुत लोकप्रिय हुई थी। इस फिल्म में एक गाना था – ‘अपनी तो हर आह एक तूफान है क्या करें वो जानकर अनजान है’ इस गीत की सुचवेशन कुछ इस तरह थी कि देव साहब और अभिनेत्री वहीदा रहमान भारतीय रेल के पुराने फस्ट क्लास के डिब्बे में यात्रा कर रहे हैं। देवानंद नीचे की सीट पर बैठे हुए हैं तथा वहीदा ऊपर की बर्थ पर आराम कर रही हैं। रेल की यात्रा करते-करते देव साहब की इस दर्द भरी पुकार को सुनती हैं ।
प्रारंभ से ही हर दूसरी फिल्म से रेल किसी-न-किसी रूप में हमारी फिल्मों में मौजूद रहती है। इस तरह हिंदी फिल्मों को रेल के अद्भुत योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता या यूं कहें कि हमारी रेलें हिंदी फिल्मों की जान हैं।
अनुपमा, पाकीजा, गंगा जमुना, सोलहवां साल, आशीर्वाद, अजनबी, आराधना, सत्ता ईस डाउन, आप की कसम, जमाने को दिखाना है, नायिका, छोटी-सी बात, बातों-बातों में, शोले, दीवार, जानी दुश्मन, विधाता, साधना, दिलवाले दुल्हशनियां ले जाएंगे, जब वी मेट, परिणिता, किक, रोबोट, द् वर्निंग ट्रेन, कुर्बान, तेज, दबंग, तीसमार खां, चेन्नबई एक्सतप्रेस, साथिया, बजरंगी भाईजान, 1:40 की लास्ट लोकल ट्रेन, पाथेय, पांचाली, देवदास, द ट्रेन, रावन, वांटेड, अमर प्रेम, ग्रुप, मोहब्बतें, खागी, स्मलडॉग मिलेनियर, आदि वो फिल्में हैं जिनकी रेलवे के बिना कल्पना नहीं की जा सकती।
वैसे तो फिल्म निर्माता अपनी फिल्म की सुचवेशन एवं सुविधा के अनुसार रेलवे स्टेशन का चुनाव करते हैं, लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस मुंबई, लोनावला, खंडाला, पनवेल, चौक, आपटा, पुणे मंडल का पाठार आदि निर्माताओं के प्रिय स्टेशन हैं। जहां निर्माता को शूटिंग करना बेहद भाता है। पनवेल से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आपटा स्टेशन फिल्मकारों की सबसे प्रिय जगह है, जहां पुरानी फिल्म अमर प्रेम से लेकर दिलवाले दुल्हकनियां ले जाएंगे, कुछ कुछ होता, ग्रुप, मोहब्बतें, खागी, स्लमडॉग मिलियनेयर सहित कई फिल्मों एवं टी.वी. सीरियलों की शूटिंग हो चुकी है। वैसे ही पश्चिम रेलवे के कांदिवली, महालक्ष्मी कार शेड, गोरेगांव, माटुंगा, महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन, लोवर परेल, मुंबई सेंट्रल एवं चर्चगेट स्टेशन, बांद्रा टर्मिनस, बांद्रा रेलवे कालोनी भी निर्माताओं को खूब आकर्षित करते हैं।
1966 में शशि दा की एक यादगार फिल्म थी अनुपमा। फिल्म के अंतिम सीन में मितभाषी बेटी ‘शर्मिला टैगोर’ अपने पिता का विरोध कर अपने प्रेमी धर्मेंद्र के गांव जाने के लिए गाड़ी में सवार हो जाती हैं। बेटी के दोस्त उसे छोड़ने रेलवे स्टेशन पर आते हैं। पिता प्लेटफार्म पर एक खंबे के पीछे से छिपकर सब कुछ देख रहे हैं। कैमरा उनपर टिकत है और फिल्म समाप्त हो जाती है। अनेक फिल्म समीक्षा इसे रेलवे स्टेशन पर फिल्माया गया ऐतिहासिक यादगार दृश्य मानते हैं।
नायिका ट्रेन की खिड़की पर बैठी पुस्तक पढ़ रही है, नायक रेल पटरी के साथ-साथ चलती सड़क पर खुली जीप में अपने मित्र के साथ नायिका से सवाल पूछता है – ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ जी हां फिल्म सन 1969 में आई सुपर हिट फिल्म का यह लाजवाब दृश्यन दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की टॉय ट्रेन में फिल्माया गया एक अद्भुत दृश्यृ है जिसे हिंदी फिल्मों के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।
सन 1972 में आई सुप्रसिद्ध फिल्म ‘पाकीजा’ का दृश्य याद कीजिए जब साहिब जान ट्रेन के डिब्बे में मीना कुमारी के पांव को देखकर सहयात्री सलीम ‘राजकुमार’ उन्हें एक पुर्जे पर लिखकर देते हैं और कहते हैं कि आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें जमीन पर मत उतारिये मेले हो जाएंगे।
सन 1974 में दो फिल्मै आई थीं जिनमें सत्तापईस डाउन वह फिल्म थी जिसमें ट्रेन ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अवतार कृष्णाद कॉल द्वारा निर्देशित इस फिल्म में राखी और एम के रैना ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। यह फिल्म रमेश बख्शी उपन्यास 18 वर्ष के पौधे पर आधारित थी। फिल्म में संगीत दिया था हरिप्रसाद चौरसिया एवं भोनेश्वखर मिश्रा ने। इस फिल्म को 21 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में बेस्ट सर्वोत्कृ ष्टि हिंदी सुविचार फिल्म तथा पूर्व किशोर वीर को सर्व उत्कृष्ट सिनेटोग्राफर का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। यह अवतार कॉल की एकमात्र फिल्म थी, लेकिन यह दुखद रहा कि जिस हफ्ते पुरस्कार की घोषणा की गई थी, उसी हफ्ते अवतार कॉल का एक दुर्घटना में निधन हो गया। यह फिल्म सत्तातईस डाउन मुंबई-वाराणसी एक्सप्रेस में फिल्माई गई, जिसमें रेल कर्मचारी एम. के. रैना तीर्थयात्रा हेतु वाराणसी जा रहे हैं और फ्लैश बैक में फिल्म चलती है। अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए चित्रकार एम. के. रैना अपने पिता के स्थान पर रेलवे में टिकट कलेक्टर हो जाता है और उसकी मुलाकात गाड़ी में जीवन बीमा निगम कर्मचारी शालिनी (राखी) से होती है। फिल्म का अंत दुखद है यह फिल्म तत्कालीन मुंबई वी.टी. स्टेशन पर फिल्माई गई थी। सन 1974 में ही आई फिल्म अजनबी का राजेश खन्ना और जीनत अमान पर गाड़ी की छत पर फिल्माया गया बेहतरीन गीत ‘हम दोनों दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले’……. कौन भूल सकता है ?
आपको याद होगी सन 1979 में मुंबई की लोकल ट्रेन में फिल्माई गई बेहद लोकप्रिय फिल्म ‘बातों-बातों में’ यह फिल्मल मुंबई की लोकल ट्रेन में परवान चढ़ती नैनसी (टीना मुनीम और रॉनी अमोल पालेकर) की प्रेम कहानी पर आधारित थी दोनों की मुलाक़ात लोकल ट्रेन में हुई है। टॉनी कार्टूनिस्ट है जो लोकल के डिब्बे के आखिरी कौन में बैठी खूबसूरत लड़की नैनसी का पोर्ट्रेट बनाना शुरु कर देता है, जिससे उसके अंकल (डेविड) तो खुश होते हैं, लेकिन नैनसी नाराज हो जाती है, लेकिन अब 9:15 की इस लोकल मैं नैनसी की एक झलक पाने के लिए टॉनी अपनी नौकरी बदल लेता है, क्योंकि उसके ऑफिस का टाइम जल्दी होता है। लोकल ट्रेन में फिल्माई गई ऐसी प्रेम कहानी फिर देखने को नहीं मिलेगी।
रेल के डिब्बे से शुरु होकर रेल के डिब्बे में ही खत्म होने वाली यादगार फिल्म थी वी. आर. चोपड़ा की ‘द् वर्निंग ट्रेन’ यह भारत की पहली और एकमात्र ऐसी फिल्म थी, जो पूरी तरह रेलवे पर केंद्रित थी। इसमें रेलवे के उच्च अधिकारी की भूमिका निभा रहे विनोद खन्ना के अधिक प्रयास के बाद दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली सुपरफास्ट ट्रेन थी। उद्घाटन यात्रा प्रारंभ हुई है, लेकिन बीच रास्ते में ही एक षड्यंत्र के कारण उसमें आग लग जाती है और ब्रेक भी फेल हो जाते हैं। फिल्म में रोचक घटनाओं का एक लंबा सिलसिला पिरोया गया था, इसमें धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, परवीन बॉबी, विनोद मेहरा, डैनी सहित लगभग दो दर्जन सितारे इसकी यात्रा में थे। आपको याद होगा कि नजदीक आ रही मौत के साए में भी किस तरह जितेंदर और नीतू सिंह रोमांस करते हैं और ट्रेन के डिब्बों में ही सारी यात्रा को ‘पल दो पल का साथ’ हमारा गीत गाते हैं। फिल्म बहुत अधिक सफल तो नहीं हुई, लेकिन इसके बाबजूद भी वी. आर. चोपड़ा की इस कोशिश को आज भी सराहनीय व सार्थक माना जाता है और इस बात कर श्रेय उन्हींग को दिया जाना चाहिए कि उन्होंने ट्रेन विभीषिका पर आधारित पहली फिल्म बनाई।
सन 1981 में फिल्म जमाने को दिखाना है एक साधारण प्रेमकथा थी, लेकिन इस फिल्म में एक बेहद खूबसूरत गीत ट्रेन की छत पर ऋषि कपूर और पद्मनी कोल्हापुरी पर फिल्माया गया था ‘होगा तुमसे प्यार कुछ……’ यह इस गीत का न केवल फिल्मांकन बहुत सुंदर था बल्कि इस गीत का संगीत भी कर्णप्रिय था।
एक बेहद ही संवेदनशील एवं भावप्रवण दृश्य की चर्चा यहां निहायत जरुरी है सन 1983 में एक फिल्म आई थी ‘सदमा’ जिसमें एक स्कूल मास्टर कमल हसन दुर्घटना के बाद अपनी यादाश्त खो चुकी लड़की ‘श्रीदेवी’ की देखभाल करता है और जब उसकी यादाश्ता वापस आ जाती है तो वह ऊंटी स्टेशन पर अपने घर जाने के लिए ट्रेन में सवार हो जाता है। श्रीदेवी अपने पिता कमल हसन को नहीं पहचानती है। कमल हासन बीते अनेक वर्षों की घटना को याद दिलाने के लिए स्टेशन पर ही बहुत सारे प्रयास करता है, लेकिन श्रीदेवी को कुछ भी याद नहीं आता। ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ती है और कमल हसन बंदरों जैसी ऊल-जलूल हरकतें करने लगता है। श्रीदेवी उसे देख कर कहती है कि शायद कोई पागल है और यही फिल्म समाप्ती हो जाती है। आंखों में आंसू भरी सिनेमा हॉलों से दर्शक क्या कभी इस दृश्य को भूल पाएंगे।
शाहरुख खान को हमारी रेल से कुछ ज्यादा ही लगाव है। उनकी अनेक फिल्मों में रेल के दर्शन होते हैं सन 1995 की सुपरहिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हननियां ले जाएंगे’ में हालाकि किंग खान और काजोल अपनी छुट्टियों के दौरान यूरो रेल में मिलते हैं, लेकिन फिल्म का आखिरी दृश्य आपको वहां भी याद होगा, जब सिमरन अपने प्रेम राज से मिलने के लिए प्लेटफार्म पर दौड़ती है, राज ट्रेन में सवार है और पिता के अमर-संवाद ‘जा सिमरन जा जी ले अपनी जिंदगी’ के बाद राज भारी भरकम लहंगा पहने सिमरन का हाथ पकड़ कर उसे अंदर खींच लेता है। फिल्म में यह दृश्य पंजाब का बताया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह दृश्य हमारे मुंबई मंडल के आपटा स्टेशन पर फिल्माया गया था।
वैसे तो अनेक गीत ट्रेन की छत पर फिल्माए गए हैं, लेकिन सन 1998 में आए फिल्म ‘दिल से’ का गीत ‘चल छइयां छइयां’ अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण इतिहास में अमर हो गया है। यह गीत सुप्रसिद्ध संगीतकार ए. आर. रहमान की एक क्लासिक रचना है। इस गीत को नीलगिरि माउंटेन रेलवे में शाहरुख खान और मलाइका अरोड़ा पर फिल्माया गया है। हां कुछ यू है कि शाहरुख रेलवे स्टेशन पर मनी कोइराला को देखते हैं और उनके मन में आम बॉलीवुड के हीरो की तरह प्रेम का प्रष्फूटन होता है, जो गीत और नृत्य के रूप में सामने आता है इस गीत की विशेषता यह है कि इसे रेलवे के बी.एफ.आर. (माल गाड़ी के खुले डिब्बे) पर फिल्माया गया था और यह भारतीय फिल्मों का एकमात्र नृत्य गीत था, जो चलती ट्रेन में फिल्माया गया था।
सन 2004 में प्रदर्शित फिल्म ‘स्वदेश’ में मोहन भार्गव (शाहरुख खान) अप्रवासी भारतीय वैज्ञानिक है, जो स्वदेश लौटता है और ट्रेन के जनरल कंपार्टमेंट में यात्रा करता है और रेल का सामान्य श्रेणी का यह डिब्बा शहर एवं गांवों के बीच की दूरी को खत्म करता नजर आता है। हमेशा बिसलेरी पानी पीने वाले शाहरुख को प्यास लगती है। गाड़ी जब एक प्लेटफार्म पर रुकती है, तो फिर खिडकी पर बैठे शाहरुख की नजर बिसलेरी वाले को ढूंढती है, लेकिन वहां दिखाई देता है 25 पैसे में एक कुल्हड पानी वाला बच्चा। शाहरूख उससे पानी खरीदते हैं और उसे पांच रुपए का सिक्का देते हैं। गरीब बालक के लिए पांच रुपए बहुत बड़ी रकम है, वह 25 पैसे काटकर बाकी के पैसे लौटाने के लिए पाई-पाई जोड रहा है और इसी बीच गाड़ी चल पड़ती है। इस दृश्य के लिए निर्देशक आशुतोष गोवारकर की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह बहुत कम है इस पूरे दृश्य संयोजन को फिल्मकारों ने जिस कुशलता से फिल्माया है, वह बहुत मार्मिक बन पड़ा है, जिसमें शाहरुख खान के जानदार संवेदनशील अभिनय का बहुत बड़ा योगदान है। यह दृश्य भी हमारे आपटा स्टेशन पर फिल्माया गया है
सन 2005 की फिल्म ‘परिणीता’ में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे ट्रेन को बहुत सुंदर ढंग से फिल्माया गया है। सैफ अली खान और विद्या बालन पर टॉय ट्रेन में फिल्माए गए दृश्य और गीत लाजवाब बन पड़ा है।
यदि इस चर्चा के दौरान हम 2007 की फिल्म ‘जब वी मेट’ की बात न करें, तो सब कुछ अधूरा रह जाएगा। फिल्म की शुरुआत ही ट्रेन से होती है, जब करीना कपूर ट्रेन के डिब्बे में शाहिद कपूर से मिलती हैं, और मुंबई से दिल्ली की यात्रा में पूरे समय बक-बक करती रहती हैं। एक सुंदर प्रेमकथा परवान चढ़ती है, पर इंतियाज अली की इस फिल्म में हीरो-हीरोइन मिलते नहीं बिछुड़ जाते हैं।
सन 2013 में प्रस्तुत रोहित शेट्टी की बॉक्स ऑफिस सुपरहिट फिल्म चेन्निई एक्सहप्रेस की शुरुआत ही हमारे मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस प्लेटफार्म से होती है। जब चलती ट्रेन में प्लेटफार्म पर दीपिका पादुकोण को शाहरुख रेल के डिब्बे में खींच लेते हैं, याद कीजिए यह दृश्य दिल’वाले दुल्हनियां’ से प्रेरित था, बाद में कल्याण जक्शन और गोवा के वास्कोडिगामा रेलवे स्टेशन पर भी इसकी शूटिंग हुई। इस फिल्म में दक्षिण रेलवे के दूध सागर फॉल्सो का चेन्नशई एक्सइप्रेस की पृष्ठभूमि में फिल्मांधकन रोहित शेट्टी की बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाएगी।
इसके अलावा 1974 की चर्चित फिल्म ‘आपकी कसम’ में राजेश खन्ना फिल्म के उतरार्ध में रेल गाड़ी से पूरे देश की यात्रा करते हैं और पार्श्व में गीत चलता रहता है ‘जिंदगी के सफ़र में गुजर जाता है जो मुकाम वो फिर नहीं आता’ 2002 की फिल्म ‘साथिया’ में रानी मुखर्जी और विवेक ओबरॉय मुंबई की लोकल ट्रेन में मिलते हैं लंबे समय तक पीछा करने के बाद विवेक रानी के नजदीक आ जाते हैं और उससे प्रणय निवेदन करते हैं, तो रानी उससे ट्रेन से कूदने को कहती है, तो 2011 की फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ में कंगना और माधवन अपने परिवार के साथ रेलगाड़ी से वैष्णो देवी की यात्रा करने निकल पड़ते हैं। यात्रा के दौरान काफी गाना बजाना नाचना होता है और बाद में कंगना माधवन से कह देती हैं कि वह किसी और से प्यार करती है।
एक पुरानी फिल्म ‘द् ट्रेन’ जिसमें राजेश खन्ना सीबीआई ऑफिसर की भूमिका निभाते हैं कन्न ड फिल्म पर आधारित थी, जिस का उल्लेख आवश्यक है, साथ ही फिल्म देवदास के अंतिम दृश्य में शाहरुख की रेल यात्रा भी अविस्मरणीय है। बजरंगी भाईजान फिल्म का प्रारंभ ही भारत पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझोता एक्सप्रेस से होता है, तो शोले फिल्म की ट्रेन को कैसे भूल सकते हैं।
यह लेख संपूर्ण नहीं है और भी बहुत सी फिल्में होंगी, जो रेलवे की पृष्ठभूमि पर बनी है या जो रेलवे स्टेशन या रेलगाड़ी में फिल्माई गई हैं। सुधी पाठक अवगत कराएंगे तो लेख को पूरा करने में सहायता प्राप्त होगी।
भारत में हिंदी के प्रचार प्रसार में भारतीय फिल्मों की बहुत बड़ी भूमिका रही है और फिल्मों के विकास यात्रा में रेल का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उप महाप्रबंधक (राजभाषा)
मध्य रेल, मुंबई छशिमट

1 COMMENT

  1. महाप्रबंधक महोदय आपने बहुत अच्छी तरह से रेल और फिल्म के गठबंधन को लेख के जरिए प्रस्तुत किया है। वाकई जिन फिल्मो में रेल की भूमिका रहती है उन्हें देखने का आनंद ही अलग है। जेसे गंगा, जमुना और सरस्वती, शोले आदि।।

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