काव्य भाषा : गुलाब -डॉ ब्रजभूषण मिश्र ,भोपाल

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गुलाब

मैंने देखे बहुत गुलाब
देखें हों जैसे ख्वाब
मन मुग्ध, मोहित करते
इनका नहीं जवाब,मैने देखे बहुत गुलाब

लाल,गुलाबी,पीले, नारंगी
सफेद,बैगनी व बहुरंगी
हँसते, मुसकाते, भाते,देते
निज रंगों से ही जवाब,मैंने देखे बहुत गुलाब

इन्हें देख मैं करता बातें
दिन हो या हों फिर रातें
मुस्काता रहता इन जैसा
ब्रज,देता आवाज मैं दाब,मैंने देखे बहुत गुलाब

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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