नागरिक पत्रकारिता : आदमगढ़ की पहाड़ी : कैशलेश व्यवस्था कितनी कारगर ? -विनोद कुशवाहा, इटारसी

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आदमगढ़ की पहाड़ी : कैशलेश व्यवस्था कितनी कारगर ?

पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित दैनिक के माध्यम से आदमगढ़ की पहाड़ी पर ‘ सैर सपाटा ‘ शुरू होने की जानकारी मिली । अफ़सोस हुआ क्योंकि इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं इस पाषाणकालीन पहाड़िया का महत्व बखूबी जानता हूं । पुरातत्व की दृष्टि से तो इसकी महत्ता और बढ़ जाती है । बावजूद इसके आदमगढ़ की ये पहाड़िया आज भी लोगों के लिए मात्र ‘ सैर -सपाटे ‘ का स्थान ही है । दुर्भाग्यवश हम इसको अभी भी पिकनिक स्पॉट ही मानकर चल रहे हैं । जब पर्यटकों की एंट्री बन्द रहती है तब भी ये पहाड़िया शहर से दूर होने और एकांत के कारण ‘ मिलन स्थल ‘ के रूप में हमेशा खुली मिलती है । कितने ही जोड़े आपको शैलाश्रय के नीचे बैठे मिल जायेंगे । उनको इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ती है ये वही जानें । जाते समय वे क्या-क्या छोड़ जाते हैं उसे यदि आप देख लेंगे तो शर्म से आपकी आंखें झुक जायेंगीं । पिकनिक मनाने वाले तो उनसे भी ज्यादा बेशर्म होते हैं । उनके द्वारा छोड़ा गया कचरा पुरातत्व विभाग के चेहरे पर कालिख पोतने के लिए पर्याप्त है । देखरेख की यहां व्यवस्था यहां बस नाम के लिए होती है । नाम के लिए ही सुरक्षा कर्मचारी भी रहता है । ऐसा मैं इसलिये कह पा रहा हूं क्योंकि एक बार मेरी बेटी आई ए एस का एग्जाम देकर लौट रही थी तो मैंने वहां रुक कर उसको पहले शैलाश्रय दिखाना चाहा । वहां अपनी बेटी को मैं कुछ शैल चित्र दिखा ही रहा था कि शैलाश्रय के ठीक नीचे बने ततैये के छत्ते से निकलकर सैंकड़ों ततैयों ने हमारे ऊपर हमला कर दिया । हम दोनों वहां से जान बचाकर अपनी गाड़ी की तरफ भागे । बाईक से निकलने के बाद भी ततैयों ने काफी दूर तक हमारा पीछा किया । हमें जगह – जगह काटा भी । रास्ते भर मेरी बेटी रोती बिलखती रही । इटारसी पहुंचकर हम सीधे डॉक्टर के यहां गए । जहां उन्होंने हमें तत्काल एडमिट कर हमारा उपचार किया । इस समूचे घटनाक्रम के दौरान पहाड़िया पर मौजूद सुरक्षा कर्मचारी तमाशा देखता रहा । न तो उसने हमको वहां जाने से रोका था और न ही उसने हम दोनों को बचाने के लिए कोई प्रयास किये । वह अपनी जगह पर बैठा हुआ हंसता रहा । आज भी मेरी बेटी उस घटना को याद करती है तो सर से पांव तक कांप जाती है । इसके अलावा यहां अपराधिक तत्वों का जमावड़ा तो रहता ही है । अपराध भी होते रहते हैं । देश – विदेश में प्रसिद्ध इस प्रागैतिहासिक काल के अवशेषों से भरपूर आदमगढ़ की पहाड़ियां के आसपास अतिक्रमण भी अपने पैर पसार रहा है । विभाग को इन शैलाश्रय और शैलचित्रों के संरक्षण हेतु गम्भीरता से प्रयास करना चाहिए । यही स्थिति रही तो आदमगढ़ की इस विश्व प्रसिद्ध पहाड़ी पर केवल पत्थर ही शेष रह जाएंगे । पुरातत्व विभाग के अधिकारी समाचार छपवा कर पर्यटकों को लुभा तो लेते हैं परंतु उनकी सुरक्षा की कोई गारन्टी नहीं होती । विभाग ने सैलानियों हेतु ऑन लाइन टिकट रखकर उनकी मुसीबतें और बढ़ा दी हैं । कैशलेस टिकट की नई व्यवस्था के चलते पहले दिन ही कई सैलानी भुगतान न कर पाने की वजह से वापस लौट गए । फिर भी आप इस दर्शनीय स्थल का अवलोकन करना चाहते ही हैं तो सबसे पहले ऑन लाइन बुकिंग करायें । अपनी सुरक्षा की चिंता आप करें । साथ ही मास्क पहन कर अवश्य जायें । सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें । अन्यथा आप एक नई मुसीबत और घर ले आयेंगे ।

– विनोद कुशवाहा
इटारसी .

1 COMMENT

  1. आदमगढ़ की पहाड़ी का सुन्दर वर्णन और अव्यवस्था की ओर भी ध्यान खींचा।
    बहुत बड़िया भाई साहब

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