लघु कहानी : विस्मय – चरनजीत सिंह कुकरेजा,भोपाल

विस्मय

आँख खुलते ही मैं उठ कर बैठ गया।करवट बदल कर सो रही जीतो का कंधा हिलाया।”उठ जा जीतो पाँच बजने वाले हैं।चल जल्दी फ्रेश हो जा।समय पर वापस भी आना है।”
वह भी तत्काल उठ गई ।उठते ही उसने दोनों हथेलियाँ जोड़कर आँखों के सामने करते हुए अपने इष्ट के दर्शन किये और फिर आंखों पर फेरते हुए बोली”वो रात आंखों में दवाई डाली थी न..।इसलिये आज देर हो गई उठने में..पता नही आजकल पानी बहुत निकलता है आंखों से…।”मैं समझ गया फिर किसी ने इसकी दुखती रग पर हाथ रखा होगा और इसने बच्चों से बार-बार पूछे जाने वाला वही प्रश्न दोहरा दिया होगा।जिसे सुनकर बच्चे रूटीन वाला उत्तर दे कर मां को चुप करा देते हैं।
सच है मन की आंखों का असर उपरेली आंखों में आ ही जाता है।मैं उसकी हाजिर जवाब आंखों को पढ़ पाता इसके पूर्व ही उसने उन पर चश्मा चढ़ा लिया।
“मैं बस पांच मिनट में आई।आप पानी की बोतल रख लो मैं उनके लिये थोड़ा भोजन रख लेती हूँ।” “आ जाओ मैं बाहर खड़ा हूँ”।पांच मिनट के पूर्व ही उसने बाहर आकर दरवाजा बंद किया।आजकल चाबियों का झंझट नही रहता।ऑटोमेटिक लॉक ने इस झंझट से मुक्त कर दिया है।वैसे तो जीतो घर की चाबियों का गुच्छा बहुत पहले ही बहू को सौंप कर भारमुक्त हो चुकी थी।यह बात अलग है कि चाबियाँ सौंपने के बाद भी घर के प्रति अपने दायित्वों से उसने कभी खुद को अलग नही किया था।ठीक भी है…ताउम्र स्वस्थ रहने के लिये हमारा खुद का व्यस्त रहना ,आखरी सांस तक काम मे जुटे रहना बहुत जरूरी है।
घर से मंजिल तक कि सैर में शायद ही हमने कभी आपस में बात की हो।चिंतन मनन का यही तो वक्त रहता है।लौटने के बाद तो हम अपने-अपने कामों में उलझ ही जाते थे।हमारी ओर से बच्चों को कोई शिकायत न हो ,इसके प्रति हम दोनों सदैव सतर्क रहते हैं।हाँ—आपस की खटमिठ्ठी नोक झोंक से इंकार नही किया जा सकता।ये छोटी मोटी वैचारिक भिन्नता तो पति-पत्नी का प्यार मापने का पैमाना होता है।
चलते-चलते मेरी सोच को विराम लगा।देखा बिल्कुल हमारे बगल में एक नवयुवक हमारे साथ चलने लगा है।जीतो उसे देख कर मुझसे लिपट ही गई …जैसे दरख़्त से बेल। वह निश्चित ही डर गई थी।मैंने उस किशोर को गौर से देखा।
यह तो रोज तेज दौड़ता हुआ हमसे आगे निकल जाता है।और आज…।
“नमस्ते अंकल…नमस्ते आंटी”उसके अभिवादन का हमने भी मुस्करा कर जवाब दिया।पर जीतो अभी भी उसे संशकित नजरों से देख रही थी। उसका शंकित होना वाजिब था क्योंकि ,सुबह सवेरे तफरीह करने वालों के साथ होने वाले हादसों के समाचार वह रोजना अखबार में पढ़ती थी।मैं खुद भी उसके साथ चलने की मंशा जानना चाहता था।”क्यों बेटा आज थक गए क्या….जो दौड़ नही लगा रहे”
“नही अंकल वो बात नही है..
मैं रोज आपको साथ घूमते देखता हूं।आप दोनों की कैमस्ट्री मुझे बहुत प्रभावित करती है।क्या मैं आपके साथ एक सेल्फी ले सकता हूँ।”उसके प्रेमपूर्वक अनुरोध को स्वीकारते हुए हमने स्वकृति दे दी।”कर लो भई… तुम भी हमें कैमरे में कैद।बस कमरों की कैद से आजाद ही रखना हमें।
साथ चलते हुए वह धीरे-धीरे खुलता जा रहा था।”अभी कुछ ही दिन हुए यहां ट्रांसफर हुए।पत्नी बच्चे माँ पापा गांव में ही रहते हैं।यहाँ अच्छी तरह सेट हो जाऊं फिर ले आऊंगा सबको।दो बच्चे हैं मेरे।”बिना पूछे ही वह सब बताए जा रहा था अपने बारे में——।”आपके कितने पोते पोतियाँ हैं अंकल…।”मैं कुछ बोल पाता इसके पूर्व ही
जीतो ने तपाक से उत्तर दिया….”
“मिलना चाहोगे हमारे पोते-पोतियों से” नवयुवक के मिलनसार स्वभाव ने जीतो के अनावश्यक भय को दूर कर दिया था।
“क्यों नही आँटी जरूर मिलुंगा… यहाँ परदेस में मेरा कोई अपना है भी तो नही…।”
“तो आ जाओ हमारे साथ।मिलवाती हूँ तुम्हें पोते पोतियों से…।”
सैर करते हुए हम अपनी निर्धारित मंजिल तक पहुंच गए थे।
“आओ बेटा वहाँ बैठते हैं पेड़ के नीचे लगी बेंच पर।” शहर में कुछ ही पेड़ ऐसे थे जो स्मार्ट सिटी की जद में आने से और सम्भ्रांत अधिकारियों की निगाहों से अब तक बचे हुए थे।वरना…..
वह यह सोच कर हमारे साथ ही बेंच पर बैठ गया, कि हम यहाँ कुछ देर की विश्रांति के बाद घर ले जाकर उसे अपने पोते पोतियों से मिलवाएंगे।
जीतो ने वहाँ पहुंचते ही पेड़ की डाल पर टँगे सकोरे में साथ लाई पानी की बोतल उंडेली और बेंच पर बैठ कर पल्लू में बंधी चावल की एक मुट्ठी कनकी अपने सामने बिखेर दी।अनायास ही निस्तब्ध वातावरण में पक्षियों की गूंज तेज हो गई और पेड़ पर हमारी बाट ताकते परिंदे एक के बाद एक शोर मचाते हुए बिखरे दानों को चुगने आने लगे।दाना चुगते ,फिर सकोरे पर बैठ अपनी चोंच से पानी ग्रहण करते ।उनकी आवाजाही की ओर इशारा करते हुए जीतो युवक से बड़े उत्साह से बोली “ये देखो हमारे पोते-पोतियाँ ।मिलो इनसे …बातें करो …समझ सको तो समझो इनकी बोली…।”वह भाव विव्हलता में बोले जा रही थी और युवक *विस्मय* भरी नजरों से कभी पंछियों को और कभी जीतो को अपलक देखे जा रहा था।”परिन्दों का कलरव हमारी ऊर्जा को नित प्रति रिचार्ज करता है और यहीं से चार्ज हो कर हम भी अपने हिस्से के आसमान में अपनी थाह पाने में सफल हो पाते हैं।”मैं उससे सम्बोधित था।पर वह अभी भी पूर्ण *विस्माद* में अपलक देखता हुआ इस प्राकृतिक रिश्ते को आत्मसात करने का प्रयास कर रहा था।

– चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

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