काव्य भाषा : गुरू पूर्णिमा -गायत्री शर्मा”चेतना” ,नागपूर

गुरूपोर्णिमा

पढ़-लिखकर शिक्षित होकर सारी खुशिया है पाई।
मत भूलना गुरू ने ही”श्री” लिखने की शुरूआत थी कराई।।

बडे़ होकर जब शिष्य जीवन में सफल हो जाते है।
तब गुरू, शिष्य की सफलता में खुद को सफल पाते है।।

मुझ पर मेरे गुरु का करम कुछ ऐसा था।
लाख असफलताएँ पाकर भी सफल होने जैसा था।।

गुरू ने ही कराई अक्षरो-किताबो से पहचान।
उनके कर्मो से ही आज सफल है,नही भूल सकते गुरू के एहसान।।

गुरू बिन कौन सिखाये ज्ञान,
गुरुबिन कौन कराये किताबो से पहचान।
सफल होकर आज हर मुकाम पा लिया है,
वरना गुरूबिन रह जाते हम खुदसे ही अंन्जान।।

हर शिष्य पर अपने गुरू का कर्जा है,
गुरू के एहसान भूलने पर जीवन एक सजा है।

लाखों के चेक पर करते है आज हस्ताक्षर,
यह भी गुरू के दिए ज्ञान का ही नतीजा है।।

शिक्षित कराके गुरु सफल होने का तरिका सिखाते है।
अरसा बीत जानेपर भी गुरू, शिष्य से नाता निभाते है।।

@ गायत्री शर्मा”चेतना”
नागपूर

आवश्यक सूचना

कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया लिखिए तथा शेयर कीजिए।

इस तरह भेजें प्रकाशन सामग्री

अब समाचार,रचनाएँ और फोटो दिए गए प्रारूप के माध्यम से ही भेजना होगा तभी उनका प्रकाशन होगा।
प्रारूप के लिए -हमारे मीनू बोर्ड पर अपलोड लिंक दिया गया है। देखें तथा उसमें ही पोस्ट करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here