काव्य भाषा : परवाज-ए-अना – डॉ पंकज मिश्र, रीवा

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ग़ज़ल

मेरे अखलाक को मेरी मजबूरी समझते हो
तुम मुझको कितना गैर जरूरी समझते हो

तुम हमसे मिलने तो कभी आये ही नहीं
इन चंद लफ्जों के फासले को दूरी समझते हो

तुम्हें कितना गुरूर है तुम्हारी हस्ती पर
वो इक कतरा भी नहीं जिसे दुनिया पूरी समझते हो

दो लोगों से बनता है दो लोगों का रिश्ता
तुम अकेले ही तय करके मेरी मंजूरी समझते हो

मुझे इखलास है इसलिए सारी तोहमतें सहता हूँ
मेरे लाजवाब हो जाने को मेरी मजबूरी समझते हो

#निश्छल

डॉ पंकज मिश्र
रीवा

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