काव्य भाषा : दो प्रेम कविताएँ -प्रकाश रंजन ‘शैल’, पटना

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दो प्रेम कविताएँ

1
नींद नही बस आंखें मींचे
ख्वाब संजोने लगती हूं मै
यादों के बंजर धरती पर
पलक भिगोने लगती हूं मै
दिल मे इक तस्वीर बनाना
यूं ही खुद मन को बहलाना
गाता जब जग गीत मिलन के
बरबस रोने लगती हूं मै
इश्क के दाग ना हों गहरे
यूं तन को धोने लगती हूं मै
जब भी पाने लगती हूं जग
तुमको खोने लगती हूं मै।।

2

छोड़ गये तुम वहीं बसेरा
वही रात दिन वही सबेरा
वही ख्वाब आंखों मे फिरते
आंखों से मोती बन गिरते
वही बाग है वही वीरानी
वही खिजां है वही रवानी
खोयी हूं मै उन गलियों मे
बनती फिरती प्रेम दीवानी
जग को पाकर सब खो देना
जीवन की है यही कहानी
ध्रुवतारा बन आसमान मे
टिकी हुयी हूं सदियों से मै
चंदा बन तुम फिरते रहते
इस अंबर से उस अंबर तक।।

प्रकाश रंजन ‘शैल’,
पटना

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