सबक-ज़िन्दगी के: बचपन की नींव मजबूत करें -डॉ.सुजाता मिश्र

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सबक-ज़िन्दगी के

बचपन की नींव मजबूत हो

आत्मविश्वास, सुरक्षा ,आत्मसंतुष्टि ये ऐसे मनोभाव हैं जिनका विकास एक उम्र तक ही व्यक्ति में हो सकता है। उम्र का एक पड़ाव पार कर लेने के बाद आप किसी व्यक्ति में ये भाव पैदा नहीं कर सकते, फिर तो जो जैसा है वह वैसा ही रहता है। असुरक्षित है, तो जीवनपर्यंत असुरक्षित रहेगा, मनोबल की कमी है तो वो सदा रहेगी,भले ही दिखे नहीं…. अतिविश्वास का प्रदर्शन भी मनोबल की कमी ही होता है! दुनिया का कामकाज कुछ ऐसा है कि फिर आपमें जो मनोभाव – रवैया है अपने प्रति उसी अनुरूप आपसे व्यवहार किया जाएगा… डरे हुए, असुरक्षित स्वभाव के व्यक्ति को और डराया जाएगा,यहाँ तक कि अपनेपन की आड़ में भी उसे वहीं लोग मिलेंगे जो उसके भीतर छुपे इस असुरक्षा के भाव को पोषित करेंगे… बेईमान हैं तो आपको स्वत: बेईमान लोगों की संगत मिलेगी, जो आपकी बेईमानी को आपकी ताकत बताकर आपको और नीचे खींचेगी, हालाँकि आपको लगेगा आप ऊपर उठ रहे हैं! दुर्योधन के मन में पांडवो के प्रति ईर्ष्या और विद्वेष के भाव बचपन से ही शकुनी मामा की देन थे, आगे चलकर कर्ण जैसे मित्रों ने उसके इसी मनोभाव को और पोषित किया! भीष्म पितामह,विदुर, वेदव्यास किसी की सलाह, परामर्श कभी दुर्योधन में सकारात्मक विचार नहीं पैदा कर पाई।

इसलिए अपने बच्चों में शुरुआत से ही आत्मविश्वास, सुरक्षा,स्वाभिमान और आत्मसंतुष्टि के भाव जगाने का प्रयास कीजिये…. एक कमजोर,असुरक्षित बालक कभी भी आत्मविश्वासी – स्वाभिमानी युवा नहीं बन सकता… दुनियाँ बनने नहीं देगी! ऐसा व्यक्ति जीवन में कुछ हद तक सफल अवश्य हो सकता है पर भयमुक्त नहीं…. और उसका यह भय ही जीवन भर उसकी कमजोरी बना रहेगा!

– डॉ.सुजाता मिश्र

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3 COMMENTS

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