विविध : यात्रा ईश्‍वर के अपने देश की – विपिन पवार,मुंबई

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यात्रा वृत्तांत
यात्रा ईश्वर के अपने देश की
विपिन पवार

केरल राज्य भारत की दक्षिण-पश्चिम सीमा पर अरब सागर तथा सह्याद्री पर्वत श्रृंखलाओं के बीच में फैला हुआ है। इस राज्य का कुल क्षेत्रफल केवल 38,863 वर्ग किलोमीटर है। केरल की राजभाषा मलयालय है, लेकिन ऊर्दू भी बोली जाती है। एक खास बात यहां पर देखने को मिली कि केरल में यदि आप पर्यटन के लिए जाते हैं और आपको केवल हिंदी आती है, तो भी आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। सुदूर गांवों में भी अच्छी हिंदी बोलने वाले केरलवासी मिले। दक्षिण भारत में भाषाई और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य के कारण विख्यात जो चार राज्य हैं, केरल उनमें से एक है। अरब सागर में स्थित केन्द्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप का भाषा एवं संस्कृति की दृष्टि से केरल के साथ अटूट संबंध है।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व का केरल विभिन्न राजा-राजवाड़ों की रियासत था। तिरूवितांकूर और कोच्चि रियासतों को जोड़कर 1 जुलाई 1949 को तिरुकोच्चि राज्य का गठन किया गया। आज जो मलाबार है, वह अंग्रेजी रियासत के अंतर्गत मद्रास राज्य (वर्तमान तमिलनाडु) का एक जिला मात्र था। 1 नवंबर 1956 को जब तिरूकोच्चि के साथ मालाबार को भी जोड़ा गया, तब वर्तमान केरल राज्य बना।
केरलवासियों को अपने प्राचीन इतिहास, दीर्घ कालीन वैदेशिक व्यापार संबंध, विज्ञान एवं कला की समृद्ध परम्परा पर गर्व होना स्वाभाविक ही है। साक्षरता की दर में केरल को समूचे भारत में सर्वोत्तम स्थान प्राप्त है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार केरल की जनसंख्या 3,18,41,374 है तथा साक्षरता की दर 90.9% (पुरुष 94.2% तथा स्त्री 87.02%) है। सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य स्तर, स्त्री-पुरुष समता, कानून का पालन, शिक्षा का प्रसार आदि विभिन्न क्षेत्रों में केरल का स्थान प्रथम है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि शिशु मृत्यु दर केरल में सबसे कम है। यहां पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक है।
केरल, यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त विश्व का प्रथम शिशु सौहार्द राज्य (Baby friendly state) है।
भारी वर्षा से अनुगृहीत केरल राज्य ‘शस्य श्यामल’ एवं जल समृद्ध है। केरल पर्यटकों का प्रिय स्थल है, क्योंकि केरल की जलवायु उत्कृष्ट है, यहां यातायात की अच्छी सुविधाएं हैं और यह समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं वाला राज्य है। धार्मिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध यह राज्य विभिन्न संस्कृतियों की संगम भूमि है। यहां हिंदू, मुसलमान एवं ईसाई लोग सौहार्द एवं भाईचारे का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उच्च राजनीतिक चेतना, जनता पर मीडिया का प्रभाव, विभिन्न संस्कृतियों को आत्मसात करने की क्षमता आदि कई बातों में केरल भारत के भू-भागों में विशेष स्थान रखता है।
भूमध्य रेखा से केवल 8 अंश की दूरी पर स्थित होने के कारण केरल का मौसम गरम रहता है। यहां की ऊंची-नीची धरती भी जलवायु को प्रभावित करती है। यहां जनवरी से मई तक गरमी और जून से दिसंबर तक वर्षा होती है। फरवरी की सर्दी नाममात्र की होती है, जो यहां घूमने का सर्वश्रेष्ठ मौसम है। यहां का तापमान 22 अंश सेल्सियस से नीचे नहीं जाता, समुद्र तट के निकट 17 अंश सेल्सियस तापमान होता है। अधिकतम तापमान 38 अंश सेल्सियस तक चला जाता है। वर्षा केरल में खूब होती है। भारी वर्षा एवं शीतल मंद हवा के कारण केरल प्राकृतिक रूप से पर्याप्त समृद्ध है।
केरल की जनता उत्सवप्रिय है। यहां मनाए जाने वाले पर्वों, उत्सवों एवं त्यौहारों में कई का संबंध देवालयों से हैं अर्थात वे धर्माश्रित है तो कई अन्य उत्सव धर्मनिरपेक्ष हैं। ओणम केरल का राज्योत्सव है। सामाजिक मेल-मिलाप एवं आदान–प्रदान की दृष्टि से इन उत्सवों का विशेष महत्व है। हिंदू त्यौहारों में विषु, नवरात्रि, दीपावली, शिवरात्रि, तिरुवातिरा प्रमुख हैं, तो मुसलमान रमजान, बकरी ईद, मुहर्रम, मिलाद-ए-शरीफ मनाते हैं। ईसाई क्रिसमस एवं ईस्टर मनाते हैं। त्यौहारों पर हाथियों की सजावट तो देखते ही बनती है। केरल में मेलों को पूरम कहा जाता है। त्रिस्सूर का मेला तो विश्वथप्रसिद्ध है। सर्पाकार बड़ी-बड़ी नौकाओं की प्रतियोगिता के लिए तो अनेक छायाकार प्रतीक्षारत रहते हैं। यह प्रतियोगिता ओणम पर आयोजित की जाती है। एक नौका में लगभग 150 लोग लयबद्ध रुप से संगीत के साथ नौका को दौड़ाते हैं।
केरल में किसी चीज की कमी नहीं है। यहां प्रकृति ने दोनों हाथों से भर-भर कर प्राकृतिक संसाधन लुटाए हैं। शायद इसीलिए केरल को ‘ईश्व र का अपना देश’ (God’s own country) कहा जाता है। उष्ण मौसम, समृद्ध वर्षा, सुंदर प्रकृति, जल की प्रचुरता, सघन वन, लंबे समुद्र तट, चालीस से अधिक नदियां, केरल वासियों का आतिथ्य सत्कार, मृदु व्यवहार, उपलब्ध यातायात एवं अन्य सुविधाओं के कारण केरल विश्ववभर में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
केरल की भौगोलिक प्रकृति अनूठी है। यहां यदि पर्वतीय क्षेत्र है, तो समतल एवं समुद्री क्षेत्र भी है। एक ही राज्य में पर्वत, घाटी, मैदान, वन, समुद्र तट का एक साथ आनंद लिया जा सकता है। किंवदन्ती है कि महाविष्णु के दशावतारों में से एक परशुराम ने अपना फरसा समुद्र में फेंक दिया था, उससे जो स्थान उभरकर निकला, वही केरल कहा जाता है। प्राचीन विदेशी यायावरों ने इस स्थल को ‘मलाबार’ नाम से भी संबोधित किया है। केरल में नारियल के पेड़ जहां-जहां दिखाई देते हैं। नारियल को मलयालम में केरा या नालिकेरम कहते हैं, इसलिए नालिकेरम या केरा की बहुलता के कारण ‘केरल’ नामकरण सार्थक जान पडता है।
केरल की संस्कृति हजारों साल पुरानी है। प्रारंभ में लोग पहाड़ी इलाकों में रहते थे। केरल के कुछ भागों से प्राचीन प्रस्तर युग के कतिपय खंडहर तथा महाप्रस्तर स्मारिकाएं प्राप्त हुई हैं, जो केरल में हजारों वर्ष पहले मानव जीवन की प्रामाणिक जानकारियां देती हैं। ईसा की पहली शताब्दी में सन 345 में संत थॉमस ने, जो कानायि निवासी थे, केरल में पश्चिम एशिया के समुद्र से प्रवेश किया। संत थॉमस भारत में ईसाई धर्म के प्रणेता माने जाते हैं।
केरल के पर्यटन स्थलों में निम्नलिखित स्थानों पर समय व्यतीत करने पर लगता है कि आप ईश्वमर के अपने देश की यात्रा करने वाले सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से एक हैं :-

कोवलम समुद्र तट :-

केरल की राजधानी तिरूवंनतपुरम (त्रिवेन्द्रिम) से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित अंतर्राष्ट्रीसय ख्यामति का कोवलम समुद्र तट वास्तंव में तीन समुद्र तटों ( बीचों) का संगम हैं ,जिनमें से दीपघर समुद्र तट ( लाइट हाउस बीच) विशेष आकर्षण का केन्द्र् है। समुद्र तटपर पहुंचते समय रास्तेम में अनेक सस्ते निसर्गोपचार एवं आयुर्वेद के केन्द्रे हैं,जो सरकारी मान्यदता प्राप्त हैं। केरल की आयुर्वेद चिकित्साि पद्धति विश्वटविख्‍यात है। पर्यटक निर्भय होकर इसका लाभ उठा सकते हैं। मेरा अनुभव है कि इस मामले में यहां कोई धोखाधड़ी तथा छल-कपट नहीं है, जैसा कि आम पर्यटन स्थिलों पर होता है। शासन व्दातरा अनुमोदित दरों पर आप स्व र्गिक आनंद उठा सकते हैं।

शंखमुखम समुद्र तट :-

राजधानी से 8 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस समुद्र तट पर 35 मी. लंबा मत्स्यकन्या का चित्ताकर्षक शिल्प है। समुद्र तट पर तारामछली (स्टारफिश) के आकार का एक फ्लोटिंग (पानी पर तैरता) रेस्टारेंट है तथा बच्चों के लिए यातायात का एक प्रशिक्षण पार्क भी है। पास ही अक्कुलम तथा वेली पर्यटक ग्राम भी बनाए गए हैं।

चोवारा समुद्र तट :-

तिरूवनंतपुरम में कोवलम बीच से दक्षिण में 8 कि.मी. दूरी पर सफेद रेत वाला प्राचीन मछली पकड़ने का विख्यात समुद्र तट है।

पूवार समुद्र तट :-

कोवलम से दक्षिण में 12 कि.मी. की दूरी पर मनमोहक पूवार बीच है, जो प्राचीन काल में व्यापार का मुख्य केन्द्र था, आज पर्यटकों से आबाद रहता है।

पापनाशम समुद्र तट :-

तिरुवनंतपुरम से 45 कि.मी. की दूरी पर वरकाला में पापनाशम बीच है, जिसमें डुबकी लगाने से भले ही आपके पाप नष्ट न हो, लेकिन यदि आपको कोई चर्मरोग है, तो वह ठीक हो जाएगा।

तंगासेरी समुद्र तट :-

कोल्लम से 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस ऐतिहासिक स्थान पर 18 वीं सदी में निर्मित पुराने पुर्तगाली किले एवं चर्च हैं। यहां समुद्र तट से सूर्यास्त एवं चंद्रोदय का मनोहारी दृश्य एक साथ देखना तो अवर्णनीय है।

अलपुझ्झा समुद्र तट :-

शहर से 3 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस तट पर 137 वर्ष पुराना स्तंभ है, जो आकर्षक है।
केरल में देखने लायक अनेक समुद्र तट हैं जैसे तिरुमल्लवरम, फोर्ट कोचि, चेराई, नाटिका, तनूर, पदिनजरेक्करा, वल्लिकुन्नु, कोडिकोड़े, बायपोर, कप्पड, तिक्कोटी, पय्योली, वडाकारा, पय्यमबलम, किझुन्ना, मीनकुन्नुक, मुझाप्पिलंगड, धर्मोदम, एझिमाला, बेकल फोर्ट, कप्पिल, कन्वतीर्थ आदि। लेकिन प्रत्येमक समुद्र तट पर जाना श्रमसाध्य तथा कष्टकर है। मेरे जैसे अकेले व्यक्ति के लिए संभव हो पाया था।

विश्व विख्यात बैकवाटर्स :-

केरल के बैकवाटर्स पूरी दुनिया में विख्यात है, जिसके कारण यहां विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। यहां झीलों को नहरों के माध्यम से आपस में जोड़ दिया गया है और 900 कि.मी. का अप्रवाही जलमार्ग तैयार किया गया है, जो बैकवाटर्स कहलाता है। इस प्रशांत एवं मनोहर बैकवाटर में 60 फीट लंबी नौकाएं (केट्टुवल्लोम) चलती हैं, जो पर्यटकों को 24 घंटे में ईश्व र के अपने देश के बैकवाटर्स की सैर कराती है, जो अपने आप में एक राजसी अनुभव से कम नहीं है, लेकिन यह अनुभव खासा खर्चीला है, जो आपके बजट को गड़बड़ कर सकता है।
तिरुवल्लम, वेली, अक्कुलम, कप्पिल, कोल्लम, अलुमकडावु, अलपुझ्झा, कुट्टनाड, पतिरमनाल, कुमारकोम, कोच्चि, कोझिकोडे, वलियापरम्बा, कोट्टापुरम आदि अनेक बैकवाटर्स हैं, लेकिन यदि आप तिरुवनंतपुरम में हैं, तो तिरुवल्लम, वेली, अक्कुलम में से किसी एक स्थान पर जाकर केरल के विश्वनप्रसिद्ध बैकवाटर्स का आनंद उठा सकते हैं। कहा जाता है कि यदि केरल के बैकवाटर्स नहीं देखें, तो केरल की यात्रा तो अधूरी ही रह गई।

पर्वतीय स्थल (हिल स्टेशन) :-

केरल, पश्चिमी घाट पर स्थित होने के कारण यहां अनेक हिल स्टेशन हैं। तिरुवनंतपुरम से 61 कि.मी. की दूरी पर समुद्र सतह से 915 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पोनमुडी में डियर पार्क और ट्रेकिंग के अलावा खूबसूरत आर्किड भी देखने को मिलते हैं। इडुक्की से 60 कि.मी. की दूरी पर स्थित मुन्नार ब्रिटिश शासन का ग्रीष्मकालीन आवास हुआ करता था। अन्य हिल स्टेशनों में देवीकुलम, पीरमेडु, वागामोन, नेल्लियामपट्टी, धोनी, वायतिरी, लक्किड़ी, पयतलमाला, कोट्टनचेरी, रानीपुरम आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं। अपने चित्ताकर्षक हरित चायबागानों के कारण यहां पर्यटकों की भीड़ रहती है। यहां दृश्य ऐसे दिखाई देते हैं, मानो हम कोई चित्र देख रहे हो।

वन्य प्राणी अभयारण्य :-

घने जंगलों के कारण केरल में 14 वन्य प्राणी अभयारण्य बनाए गए हैं। प्रकृति प्रेमियों को यहां के अभयारण्यों से निकलने का मन ही नहीं करता। नय्यर, पेप्पारा, शेंदुरुनी, इडुक्की, पेरियार, इराविकुलम, चिन्नार, तटेक्काड, पीचि वझानी, चिम्मिनी, परंबिकुलम, साइलेंट वैली, वायनाड, अरालम आदि अभयारण्यों में हाथी की सवारी का लुफ्त उठाया जा सकता है।

जलप्रपात :-

पूरे वर्ष भर तन-मन को आल्हादित करने वाले केरल के जलप्रपातों का प्राकृतिक सौन्दर्य अनूठा है। पलारुवि, अतिरापल्ली, अट्टुकाड, तोमनकुथु, तुषारागिरी, मीनमुट्टी, चेतालयम, सेंटीनल रॉक वाटरफॉल आदि प्रमुख है।
केरल विश्वा का एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां पर आयुर्वेद अपने सर्वोत्तम रुप में व्यवहार में है। राज्य की एक समान जलवायु, वनों की प्रचुरता, शीतल मानसून तथा अध्ययनशील प्रवृत्ति आयुर्वेद को पुष्पित-पल्लवित कर रही है।

स्मारक :-

केरल में पद्मनाभ स्वामी मंदिर, कुतिरमलिका (पुत्तेनमलिका) पैलेस संग्रहालय, नेपियर संग्रहालय, पद्मनाभपुरम पैलेस, कृष्णपुरम पैलेस, सेंट फ्रांसिस चर्च, सांताक्रूज बेसिलिका, मट्टनचेरी (डच) पैलेस, मट्टनचेरी सिनेगॉग, बोलगेट्टी पैलेस, हिल पैलेस संग्रहालय (त्रिपुनीतुरा), चीनी फिशिंग नेट्स/वास्को-डि-गामा स्क्वेयर, पलक्काड़ फोर्ट, तली मंदिर, सेंट एजेंलो फोर्ट, तलास्सेरी फोर्ट, तोडीकुलम शिवमंदिर, बेकल फोर्ट, अनंतपुर लेक टेंपल देखकर पता चलाता है कि केरल हजारों वर्षों से विभिन्न संस्कृतियों की संगम स्थली रहा है।
स्मृतिचिन्ह के रुप में केरल से तांबे एवं टिन से निर्मित अंडाकार आईना खरीदा जा सकता है, जो तब से बनाया जा रहा है, जब से आईना सिर्फ राजा-महाराजाओं के पास हुआ करता था। इसे ‘अरनमुला कन्नाडी’ कहते हैं। गहनों की कलात्मक पेटी ‘नेट्टूर पेट्टी’ खरीदी जा सकती है, हस्तशिल्प की साड़ियां ‘कसावु मुंडु’ ली जा सकती हैं, शुद्ध मसाले एवं परम्परागत स्वर्णाभूषण भी ले सकते हैं। लेकिन ये वस्तुएं सरकारी लाइसेंस प्राप्त दूकानों से ही लेना ठीक है।
पता ही नहीं चला कि ईश्वनर के अपने देश में 15 दिन कैसे बीत गए। मधुर स्मृतियों को मन में संजोए दक्षिण रेल की उप महाप्रबंधक (राजभाषा), तिरुवनंतपुरम मंडल के राजभाषा अधिकारी एवं सेलम मंडल की राजभाषा अधीक्षक के अपनत्व भरे सहयोग से अभिभूत होकर मैं रेलवे की अपनी दुनिया में वापस लौट आया।
उप महाप्रबंधक (राजभाषा)
मध्य रेल, मुंबई छशिमट

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1 COMMENT

  1. केरल का यात्रा वृतांत बहुत ही सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है

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