काव्य भाषा : योगमाया -मिष्ठी गोस्वामी, दिल्ली

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योगमाया

सुनो
परिधि के किसी हुक में अटकी माया
अपनी धुरी को तलाशती माया
पहुंच गई हूँ अपनी माँ के पास
बाबा से नाराज हैं माया
क्योंकि बाबा को अंजाम पता था
फिर भी?
क्या एक बार भी ना सोचा
चलते समय ही सही
एक बार गले तो लगाया होता
मेरी परिधि से बिंदु
वो लाल सुनहरा बिंदु
टूट चुका था
अब कलेजे में उसके टुकड़ों की
चुभन ही थी

वक़्त में जम चुकीं ये चुभन
आज बहती आंखों में चुभ रही हैं
जिस्म के हर हिस्से से
दबी हुई आवाजें चीत्कार उठी
जिंदगी के चक्के ने
पहिया ऐसा घुमाया
की जिस्म के हर कोने में
चुभन बस गई
आज ,
आज आई हूं
अपनी माँ से मिलने
पहली बार
मन हो रहा हैं
आंखों से सारा लावा बहा दूँ
अगर एक बार
माँ कलेजे से लगा ले
क्योंकि माँ ने तो
उस सांवरे के अलावा
जिंदगी से कुछ चाहा ही नही
इतने बरसों बाद
माँ टूटी बैठी हैं
अपने अंगना में
उसी की यादों में खोई
ओर मैं,
मैं तो कभी
जुड़ ही नही पाई
ना रिश्तों से
न अपने अंदर बैठी माया से
चलो मिलती हूँ अपनी माँ से
माँ….
तुम कौन?
मैं माया,
तेरी माया माँ
मेरी माया,
हाहाहा
माया तो है ही ठगनी
तू तो छलिया की ठगनी है
पहले छलिया छल गया
अब तू ठगने आई है
माया तू महाठगिनी
जा तू छलिया को ठग
वो तुझे चलेगा
मेरे पास तो उसकी यादें ही बहुत हैं
माया तू महाठगिनी
माँ,मुझसे ज्यादा कौन ठगा गया होगा
मैं ?
मैं महाठगिनी माँ

– मिष्ठी गोस्वामी,दिल्ली

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