कथा – कहानी : उम्र – अंजू निगम देहरादून

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उम्र

“ये क्या आबनूसी रंग पहन रखा है!!!!और इतने गहरे रंग की लिपस्टिक!! चेहरे की रंगत तो देख लिया करो बाहर निकलने से पहले!!” शौक से तैयार हुई मधू का ह्दय ऐसे व्यंग्य बाणो से छलनी करते प्रबल का मन कभी नहीं कचोटता|
मधू की रंगत गेहूंआ थी| अगर ये ऐब था,तो प्रबल ने इसी ऐब के साथ ताउम्र के लिए मधू का हाथ थामा था|इसके अलावा मधू में कोई खामी थी ही नही|एक बार जो उससे मिल लेता,सूरत से ज्यादा सीरत पर रीझ जाता|
कई बार मधू को लगता कि प्रबल शायद हीन भावना का शिकार है|और एक न एक दिन आयेगा जब मधू के व्यक्तित्व का प्रचंड आवेग प्रबल के मन की अडिग चट्टान को अपने स्थान से हटायेगा| पर ये मधू का दिवास्वप्न था ,जो मधू के शरीर के साथ ही दफन हो गया|
जीवन के जुड़ते सालो में बहुत कुछ बदल गया है| बच्चे बड़े हो गये है| शायद बहुत बड़े और उनका कद अपने पिता से इतना ऊँचा हो गया है कि अब उस ऊँची जगह से पिता कही दिखाई ही नही देते|
अब उम्र के इस पड़ाव में प्रबल दिवास्वप्न देखता है| जिसमें मधू उसी आबनूसी कपड़ो में,होठो पर गहरे रंग की लिपस्टिक लगाये दिखती है| उसने भी अपने को मधू के सांचे में ढाल लिया है| मधूू का हाथ अपने में समेटे आज प्रबल को वही सुकून मिल रहा हैं जो कभी मधू का सपना था,होठो पर वही स्निग्ध मुस्कान ओढें|

अंजू निगम
देहरादून

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