व्यंग्य: खुजली की बीमारी, श्रीराम निवारिया,इटारसी

व्यंग्य
खुजली की बीमारी
श्रीराम निवारिया

करोड़ों लोग खुजली से परेशान हैं। खुजली मिटाने के लिए, अरबों रुपयों का व्यवसाय हो जाता है। खुजली मिटाने की दवाई बनाकर, दवा कंपनियाँ करोड़ों रुपये कमा रही हैं। इसी तरह खुजली मिटाने की दवाई लिखकर, डॉक्टर लोग लाखों रुपये पीट रहे हैं। लेकिन मैं यदि एम.बी.बी.एस. डॉक्टर होता तो; खुजली मिटाने की दवाई कभी नहीं लिखता, मरीजों के लिए। खुजली कम चले, मैं इसकी दवाई लिखता। इससे मरीज को भी राहत मिलती, मेरा धंधा भी चलता। दवा विक्रेता की खुजली मिटती और दवा निर्माताओं का व्यवसाय जीवित बना रहता।
खुजली वाले अनेक मरीजों की तो, मैं खुजान में रुचि पैदा कर देता। वे मूड़ खुजाते-खुजाते आते मेरे पास और कहते, डॉक्टर साहब मूड़ में खुजली चलती है। कुछ दवाई दे दो ! मैं अनेक गरीब और थोड़े समझदार ग्राहकों को कहता, खुजली मिटाने की दवा क्यों लेना चाहते हो ? बहुत बुराई नहीं है खुजली में। चलने दो। मरीज मुझे आश्चर्य से देखते, आँखें फाड़कर। कुछ नाराज होते। मैं बहुत सी बातें करते हुए, उनका गुस्सा ठंडा कर देता। मैं पूछता बंधु ! खुजली क्यों मिटाना चाहते हो ? फिर तुरंत उत्तर भी देता, इसे हल्का-हल्का चलने दो। दवाई की जगह, कहता एक गुप्त ज्ञान देता हूँ। खुजली चलने से यह पता चलते रहता है कि; हमारा सिर है, हमारा शरीर है, हमारे नाखून हैं, हममें जान है। नाखून हैं तो कभी मुसीबत में, दुश्मन को नोचने के भी काम आ सकते हैं।
एक चर्मरोग का उदाहरण देकर समझाता। चर्मरोग का एक प्रकार कुष्ठ रोग होता है। इस रोग के होने की आशंका होने पर डॉक्टर, सफेद होने वाली चमड़ी पर आलपीन चुभाकर परीक्षण करता है। अगर वहाँ खुजली नहीं हो रही है, चुभन नहीं हो रही है; तो डॉक्टर मान लेता है कि, कुष्ठ रोग हो गया है। आपको खुजली रोग है, इसका मतलब है कुष्ठ रोग नहीं है। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं। लगे रहें धीरे-धीरे खुजाने के काम में। फुरसत में कम से कम ऊबोगे तो नहीं। कम से कम कोई ये तो नहीं कहेगा, क्या बैठे बैठे मक्खी मार रहे हो। कम से कम खुजली को, इतनी बुरी तथा अपमान जनक उपमा तो अभी नहीं मिली है। मुझे विश्वास है मेरी इन गहरी बातों से; मेरे पास आया मरीज, खुशी-खुशी अपनी खुजली को खुजाते रहने को तैयार हो जाता।
यदि मरीज मेरी बातों में थोड़ी रुचि लेता दिखाई देता; तो मैं बताता, अभी आपकी खुजली रचनात्मक नहीं हो पाई है। मतलब ? मैं समझाता सज्जन पुरुष ! आपके मूड़ में जब तक; देश-सेवा, समाज-सेवा की खुजली न चलने लगे, तब तक यह बुरी खुजली नहीं है। समाज सेवा जब मूड़ से बाहर बगरने लगे, तभी उसका इलाज कराने की सोचना चाहिए। अभी तुम्हारी खुजली में दम नहीं है। दवाइयाँ तुम्हारी खुजली के पास जाकर रोने लगेंगी। कहेंगी हमारा अपमान हो गया है। यहाँ हमारी जरूरत ही नहीं थी।
ख्याल रखना जब कोई कहने लगे; मुझे उस घर में, उस रूम में, उस दल में; घुटन हो रही थी। तब जाकर समझना चाहिए, असली खुजली के लक्षण उभरना शुरू हो रहे हैं। हालाँकि ऐसी खुजली की उम्र भी, बहुत लंबी नहीं होती है। ऐसी खुजली कई बार; थोड़ा धमकाने से , कई बार आसपास कोई उचित आश्रय नहीं दिखाई देने से भी, अपने आप ठीक हो जाती है। कभी-कभी छोटामोटा टुकड़ा मिल जाए, तो वह भी दवाई का काम कर जाता है।
कुछ लोग खुजली के वैश्विक ब्रांड बन चुके हैं। उनसे प्रेरणा लेने की जरुरत है। हमारे भारत में एक प्रतिभा हुई, सहारा इंडिया के सुब्रत राय। इन्हें खुजली चली, इण्डिया को सहारा देने की। इन्होंने अपनी खुजली मिटाने का कोई प्रयास नहीं किया। सुब्रत ने अपनी बीमारी को ट्रांसफर करने का सरल रास्ता चुना। अपनी खुजली भारत सरकार और जनता को ट्रांसफर कर दी। अब भारत सरकार और भारत की भोली जनता, दोनों मिलकर खुजा रहे हैं। इस बीमारी के लक्षण यही हैं कि, जब आदमी बयान देने लगे कुछ देने का; इसका मतलब है, उसे कुछ लेने की खुजान चल रही है। बहुत से लोगों को देखा होगा; उनकी खुजली मुँह में होती है, जिसे वे संभाल नहीं पाते। तब वे चढ़ जाते हैं मंचों पर, सिल जाते हैं उनके कुरते, अपनी तरफ खींचने लगता है माइक उन्हें। चिल्ला कर-अर्राकर वे कहने लगते हैं; मेरा इस देश में जन्म देश-सेवा के लिए हुआ है, मैं देश-सेवा करना चाहता हूँ।
यहाँ जनता में समझदारी की जरूरत है। अब समझ की खुजली जनता के अंदर पैदा होना चाहिए। हम यह समझें, एक व्यक्ति को; देश सेवा करवाने की जरूरत आन पड़ी है। अपनी, अपने परिवार की; वह हमसे सेवा करवाना चाहता है। आपकी मालाओं की, आपके समय की, आपके चंदे की, आपके कंधे की; उसको जरूरत है। जब तक आप ये सब नहीं देंगे, उसकी खुजली नहीं मिटेगी। बस अब आप उसकी खुजली मिटायेंगे। उसकी खुजली बड़े स्तर की है। उसकी खुजली को दिशा मिल गई है। ऐसे खुजली वालों की खुजान; कैरम की गोट की तरह होती है, वह रिवर्स मारता है। हमें दिखता है खिलाड़ी गप्पे को कैरमबोर्ड की दीवारों पर मार रहा है; लेकिन वह रिवर्स उसी गोटी को लगता है, जिसे वह मारना चाहता है। इसे कहते हैं खुजाने की कला।
खुजली का इतिहास पुराना है। जब राजा अपनी सुख सुविधाओं, ऐश्वर्यों से ऊब जाता था, सुरा-सुंदरियों से मुँह फिर जाता था; तब उन्हें खुजली चलती थी, चक्रवर्ती सम्राट बनने की। तब वे अपने अहँकार को संतुष्ट करने के लिए; अपनी ताकत का लोहा मनवाने के लिए, अपनी आकाँक्षाओं का घोड़ा छोड़ते थे। लेकिन इस बात को राजा भी नहीं समझ पाता है; न जनता समझ पाती है कि, यह खुजली मात्र राजा की नहीं होती थी। इस खुजली में राजाओं की खुजान से पैदा हुए; अवैध कीटाणुओं की खुजली ज्यादा शामिल हो जाती है, जो राजाओं को चक्रवर्ती बनाने के स्वप्न निर्माता बन जाते हैं।
अफसोस यह होता है कि; खुजली से सँक्रमित राजा, अपनी अज्ञानता का गधा छोड़ना बंद नहीं करता है। कोई इतिहास से सीखना नहीं चाहता है। इस तरह के घोड़ों-गधों को, कोई छोटा मोटा दूसरा राजा नहीं रोकेगा। यह तो तथाकथित राजाओं को पता होना ही चाहिए। दुखद और हास्यास्पद यह है कि; कौन रोक सकता है घोड़े को, इस अक्ल को खो चुका होता है खुजली की बीमारी वाला राजा। ऐसे राजाओं की बीते हजारों साल में; यह समझ भी विकसित नहीं हुई कि, कोई कुश-लव भी रोक सकते हैं मेरे गधे-घोड़ों को। और यहाँ तक बुद्धि जाने में तो अभी युगों लगेंगे कि; धरती पर मुंबई जैसे महानगर में, एक बहुत तँग धारावी बस्ती है। यह बस्ती; हवा, पानी, सड़क, न्याय, सभी बातों से तँग है। उसकी तँग गलियों में जीने-मरने वाले कोई भी स्त्री-पुरुष, बच्चों से टकरा कर कोई घोड़ा आगे नहीं बढ़ सकता। कोई भी संड मुसंड मुसीबत का मारा, बिना हिचक के पकड़ लेगा घोड़े को। वहाँ की तँग गलियों में तो फँसना ही है, हर खुजली वाले घोड़े को।

ई मेल-
shriramnivariya@yahoo.in

आवश्यक सूचना

कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया लिखिए तथा शेयर कीजिए।

इस तरह भेजें प्रकाशन सामग्री

अब समाचार,रचनाएँ और फोटो दिए गए प्रारूप के माध्यम से ही भेजना होगा तभी उनका प्रकाशन होगा।
प्रारूप के लिए -हमारे मीनू बोर्ड पर अपलोड लिंक दिया गया है। देखें तथा उसमें ही पोस्ट करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here