काव्य भाषा : जीवन एकाकी लगता है -शशि भूषण मिश्र ‘गुंजन’, चेन्नई

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ग़ज़ल

छत पर तन्हा घूम रहा हूँ चाँद मुझे साक़ी लगता है,
भीड़ में रहकर भी जाने क्यों जीवन एकाकी लगता है,

पैसा,सोहरत,नाम सभी कुछ आज है उसके पास मगर,
सबकुछ पाकर भी अंदर से जाने क्यों ख़ाली लगता है,

मन बनावटी लोगों से रहता कुछ ख़ौफ़ज़दा अब तो,
चेहरे पर मुस्कान सजाए मेले की झांकी लगता है,

सच को सच लिखना उसकी फ़ितरत ही नहीं रही शायद,
झूठ को बेपर्दा कर कहना उसको बेबाक़ी लगता है,

खुशियों की ख़ातिर प्रयोग सब करते रहते जीवन भर,
बाह्य सफलता पाकर भी क्यों भीतर कुछ बाक़ी लगता है,

ख़ुदगर्जी की सीमाओं को पार कर गया वो “गुंजन”,
झूठी तारीफ़ों को सुनना अब तो बस गाली लगता है।

शशि भूषण मिश्र ‘गुंजन’
चेन्नई

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3 COMMENTS

  1. आदरणीय देवेन्द्र सोनी जी संपादक युवा प्रवर्तक ई मैगजीन को सहृदय धन्यवाद। आपने मेरी रचना को अपनी पत्रिका में स्थान देकर अनुग्रहित किया है।

    • खुदगर्ज सोच पर चुभता व्यंग। मेरा साधुवाद।

  2. खुदगर्ज सोच पर चुभता व्यंग। मेरा साधुवाद।

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