काव्य भाषा : ज्यों वृंदावन का महोत्सव सजा हो -मदन सिंह सिन्दल “कनक”,पाली,राजस्थान

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ज्यों वृंदावन का महोत्सव सजा हो

जेष्ठ मास की तेज धुप में,
गरम हवा की लू चाल में,
तपती धरती सूरज की ज्वाल में,
करती अरदास एक इन्द्रराज,
करदो शीतल नम धरा आज,
बारिश का इंतजार आज है,
बस जीवन का आधार साज है,
आषाढ़ मास में हुआ आगाज यूँ,
इन्द्रराज का घुमा चक्रव्यूह,
घिरी गहरी घटा गगन में,
चली पुरवाई लिये बादली,
धरती को कराने मगन में,
मास सावन का आनन्द आज यों,
चले फुन्हारे लगे मदन के तीर ज्यों,
पिया मिलन की आशा जगी यों,
प्रेम रासलीला की रात गली ज्यों,
उमंग भरा उत्सव बना वो,
ज्यों वृंदावन का महोत्सव सजा हो।।

मदन सिंह सिन्दल “कनक”
अध्यापक (कवि,लेखक)
सादडी,पाली,राजस्थान।

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