काव्य भाषा : नेह की चाह में…। -प्रो आर. एन. सिंह,वाराणसी

नेह की चाह में…

नेह की चाह में हम भटकते रहे
लाख रोका नयन पर छलकते रहे
राह मैंने गुलो से सजायी मगर
पाँव नीचे सुमन वे कुचलते रहे

याद में उनकी मन मुस्कराता रहा
प्रीति राहों में उनकी लुटाता रहा
सामने भी पड़े तो नज़र फेर ली
ज़ख्म पर वे नमक ही छिड़कते रहे

साथ में साये से मेरे रहते थे जो
मुझको ही देखकर के सँवरते जो
दूर मुझसे हुए क्या ख़ता हो गई
ख़ाक ख़्वाहिश हुई हाथ मलते रहे

चाह थी मधु की पर स्वाद खट्टा रहा
सूख गुलशन गया दर्द हमने सहा
मान साहिल सफ़ीना को सौंपा जिसे
नाव दरिया में मेरी डुबोते रहे

‘साहिल’

प्रो.आर एन सिंह, मनोविज्ञान विभाग
बी एवं यू., वाराणसी

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3 COMMENTS

    • अत्यंत सुन्दर रचना,
      हार्दिक-हार्दिक बधाई🙏

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