काव्य भाषा : सबके बस की बात नहीं – अल्का पारीक , बीकानेर

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सबके बस की बात नहीं

प्रीत की हर इक रीत निभाना,सबके बस की बात नहीं।
अपने दर्द को गीत बनाना,सबके बस की बात नहीं।।

जीवन है इक दांव पेंच यहां ,हार भी है और जीत भी है।
अपनी हार को जीत बनाना,सबके बस की बात नहीं।।

खुशियों को बांहों में भर,सब नाचते हैं और गाते हैं।
गम को अपना मीत बनाना,सबके बस की बात नहीं।।

नफरत की तलवारों पर धार लगाना आसां है।
प्यार ,वफा के बाग लगाना ,सबके बस की बात नहीं।।

प्रीत की हर इक रीत निभाना ,सबके बस की बात नहीं….

अल्का पारीक
D/O पूनमचंद पारीक
बीकानेर (राजस्थान)

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