काव्यभाषा : नज्म -डॉ. अखिलेश्वर तिवारी पटना

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नज्म

तुम मेरे ख्वाबों की मल्लिका हो तेरा कोई जबाब नहीं।
तेरा नूर चारो तरफ फैला है उसका दूसरा मिशाल नहीं।

ख्वाब को हकीकत में बदल दो ऐसा दूसरा एहसान नहीं।
मुझे अपनी जिंदगी तेरे नाम करने में कोई मलाल नहीं।

तेरा साथ होने पर परवाज भरेंगे अर्श में हम हरदम।
तेरे साथ जैसा मेरे जिंदगी में कोई दूसरा सम्मान नहीं।

तेरे कुर्बत में रहने की होड़ किसी जंग से कम नहीं।
मिल गई तेरी सोहबत तो वैसा किसी का नसीब नहीं।

गर सामने तुम आ जाये कयामत भी रुक जाए एक बार।
कुदरत का हीं करिश्मा है कि तेरे जैसा दूसरा गुलाब नहीं।

मेरी जिंदगी की तवक्को तुम हीं हो इस जहां में केवल।
कैफियत मेरी नासाज हो जाती है जब तेरा जिन्दान नहीं।

डॉ. अखिलेश्वर तिवारी
पटना

परवाज-उड़ान, अर्श-आसमान,कुर्बत-नजदीक,
तवक्को-उम्मीद,जिन्दान-पिंजड़ा।

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