चाहत : अगर मिले दूसरा मौका हमें -श्रीमती विशाखा शर्मा “स्मृति” कानपुर

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चाहत – !!अगर मिले दूसरा मौका हमें!!

मैं विशाखा आपसे कुछ कहना चाहूंगी। जब हम बच्चे थे तो रहते बेखबर बेख़ौफ़ अपने अंदाजे अदब में। जैसे हमसे प्यारा हमसे मासूम संस्कारी कोई बच्चा ना हो। घर में हम भाईयों बहनों में सबसे सीधा भौंधू बच्चे का अवार्ड भी हमें ही मिलता था। मम्मी के हाथों से बनी पकौड़ियों का अवार्ड। जब सब को छः पकौड़ियां मिलें वहीं हमें दादी, मम्मी और सभी भाई बहनों से छुपा के एक्स्ट्रा दें जाये। आप सभी को पता ही होगा की मोल की या दी हुयी चीज से भी अच्छा स्वाद एक्स्ट्रा का होता है।

सच कहें तो बचपन में खुद करके शैतानी और मार अपने से बड़े भाई बहन को खाता देख दिल को जो ठंडक मिलती थी। आय हाय !क्या बताऊं उतनी तो आइसक्रीम कुल्फी भी ना दे।

कभी-कभी तो यह आलम था मम्मी बनाये होली में गुजिया फिर हम जो खाएं मन ही मन गरमा गरम गुजिया। मगर गुजिया चुराना किसी वन साइडेड युद्ध से कम भी नहीं था।

यूं छेड़ते, खेलते, लड़ते, देखते-देखते न जाने हमारी ही शैतानियों ने हमें समझ की चादर कहां से ओढा दी। अब शैतानी करने को तो दूर पूरा घर लड़ाई का अखाड़ा बन जाता है । मम्मी रेफ्री बन दोनों पालो में डाई होने की घोषणा करती है। तब पापा का सबसे प्यारा डायलॉग मम्मी के लिए – तुमने ही इन बंदरों को सर पर चढ़ा रखा है अब भुगतो।

(यह था प्यारा बचपन अगर मिले दूसरा मौका तो मैं बचपन में वापस चलीं जाऊं)

पंक्तियां
उड़ गयी जो नटखटपन की शैतानियां।
न लौटकर कभी वापस आएंगी।
बचपन का बचपना और जवानी में
बौडम होने का फर्क अब कराएंगी।
अगर मिले दूजा मौका जो तो –
मां की लाडली बन रहना संग चाहूंगी
अगर मिल जाए जो बचपन लौटकर
वापस मैं कभी न आज में आउंगी।

श्रीमती विशाखा शर्मा “स्मृति”
कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश।

1 COMMENT

  1. आपका मैं बहुत बहुत आभार व्यक्त करना चाहूंगी। आप सभी ने मेरे द्वारा रचित कविता को पसंद किया।

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