काव्य भाषा : शून्य से शून्य तक का सफर- शशि बाला,हजारीबाग

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शून्य से शून्य तक का सफर

शून्य से शुरु
शून्य तक का सफर
सारे उतार चढ़ाव,सुख दुख
धूप छाँव जैसे आते जाते रहते हैं
कैसी कैसी गलियों से होकर
गुजरना पड़ता है
कैसे टेढ़े मेढ़े ,पथरीले रास्तों पर
पाँव धरने होते हैं
अपरिमित शक्तियाँ देकर भेजता है विधाता
सात परदों में छुपाकर
हमारे ही भीतर
हम जानते भी हैं पर
कोशिश नहीं करते ढूंढने की
परदों को हटाकर झांकने की भी
जस की तस शिखा लौट जाती है
जो उजालों से भर सकती थी
जीवन के प्रत्येक क्षण को
इंतजार करती रह जाती है
कब हमारे चक्षु खुलें
माया की बिछाई धुंध की चादर
ढके रहती है सब रहस्यों को
माया ठगनी
हंसती रहती होगी
हँसने की बात ही है
क्यों न हँसे?
हम पर..
दुर्लभ मानव जन्म को व्यर्थ
गंवा देने की अक्षम्य भूल पर !

शशि बाला
हजारीबाग

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