काव्य भाषा … तुम्हारी हरी बिंदी – विनोद कुशवाहा, इटारसी

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… तुम्हारी हरी बिंदी

एक समाधान
तुम्हारे उलझे हुए बालों में
बरसती घटाओं सा .

एक आशा
तुम्हारे माथे पर
चमकती बिंदी में
हरीतिमा लिये हुए
धरा सी .

एक विश्वास
तुम्हारी आँखों के
धारदार काजल में
श्यामल आकाश सा .

एक समर्पण
तुम्हारे रक्तिम होठों पर
अरुणिमा लिये हुए
ऊगते सूरज सा .

सुनो …
तुम्हारा समूचा व्यक्तित्व
एक ग्लानि
एक दुख
एक अवसाद
को
चुनौती देती
रात सा
शबनम में भीगा
चाँद सा .

…लेकिन
तुम
जो कुछ भी हो
हमेशा से
आकर्षित करती रही हो
प्रकृति को
मौसम को
मनुष्य को
और
साथ ही
मुझको भी ।

– विनोद कुशवाहा
इटारसी .

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