समीक्षा: नीति-अनीति के धर्मयुद्ध को चित्रित करता है गरिमा संजय का नया उपन्यास – ‘ख्वाहिशें अपनी-अपनी’- देवेन्द्र सोनी

उपन्यास चर्चा – देवेन्द्र सोनी

नीति-अनीति के धर्मयुद्ध को चित्रित करता है गरिमा संजय का नया उपन्यास – ‘ख्वाहिशें अपनी-अपनी’

उपन्यास – ख्वाहिशें अपनी-अपनी
लेखिका – गरिमा संजय दिल्ली
प्रकाशक – सामयिक प्रकाशन दिल्ली
मूल्य ₹300
पृष्ठ संख्या 192 पेज

“ख्वाहिशें अपनी-अपनी” लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकारा गरिमा संजय का चौथा उपन्यास है । इससे पहले उनके तीन अन्य उपन्यास – “स्मृतियां” , “आतंक के साए में” तथा ” खट्टे मीठे से रिश्ते ” प्रकाशित हो चुके हैं जिसे सुधी पाठकों ने बेहद सराहा है।

“ख्वाहिशें अपनी-अपनी ” की शुरुआत ही ख्वाहिश से होती है ,देखिए –
” कृष्णा, मुझे कुछ तो समय दो। तुम जानती हो मेरे घर के हालात । अभी मैं शादी कैसे कर सकता हूं? तुम जानती हो, मैं तुम्हें कितना चाहता हूं। शादी तो तुम से ही करूंगा, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियां, वे भी तो जरूरी हैं। उन्हें पूरी किए बिना मैं शादी करने की सोच भी कैसे सकता हूं ? कुछ तो समझो, कृष्णा! हमारे प्यार की खातिर , कुछ तो समय दो…’ ।”
राघव के शब्द आज एक बार फिर कृष्णा के कानों में गूंज रहे थे, लेकिन वह भी क्या करती ? वह भी तो मजबूर थी ।उसके माता-पिता को उसकी शादी करने की जल्दी थी, क्योंकि उन्हें आगे दो छोटी बहनों की भी शादियां करनी थी, जबकि यह राघव था कि किसी भी तरह से शादी करने को तैयार ही नहीं हो रहा था।”
… अपनी- अपनी समस्याओं से उलझते, दोनों बस जुदा ही हो गए।

“ख्वाहिशें अपनी-अपनी ” उपन्यास तीन प्रमुख पात्रों और उनसे जुड़ी परिस्थितियां तथा परिवेश के इर्द-गिर्द रचा बसा है। इसमें कहानी की नायिका कृष्णा जहां परिस्थिति वश अपने प्रेमी राघव से जुदा होकर अपनी दो छोटी बहनों के भविष्य की खातिर ,अन्यत्र घर बसा लेती है और दमित शोषित होकर भी अनचाहे परिवार में खुशी – खुशी जीवन निर्वाह करती प्रतीत होती है, वहीं पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण “कृष्णा” से विवाह न कर सकने वाला नायक प्रेमी “राघव” अपने प्रेम प्रसंग के खत्म हो जाने से अंदर ही अंदर टूट कर भी हिम्मत नहीं हारता है और स्वयं को एक सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित कर लेता है ।
समय गुजरता है कृष्णा और राघव दोनों ही अपने-अपने कार्यक्षेत्र में संलग्न रहते हुए एक दूसरे को भुला देते हैं, पर क्या वे दोनों या कोई भी दो प्रेमी आजीवन एक दूसरे को भुला पाते हैं ? क्या यह दोनों भी अपना अतीत भूल चुके थे?
नियति का खेल भी निराला ही होता है ! कब कहां ,क्या हो जाए कोई कह सकता है,जान सकता है, भला ?
कृष्णा और राघव के साथ भी जो होने वाला था उससे वे एकदम अनजान थे । उन्हें नही पता था कि उनके प्रेम की चिनगारी पर जो राख जम गई है वह हवा के अनचाहे झोंके से फिर से सुलगने लगेगी और उसकी दग्ध तपिश में स्वाहा हुई यही राख, भस्म बन कर उनका जीवन परिपूर्ण कर देगी ! पर कैसे …?
आखिर क्या होगा जब अपने महत्वाकांक्षी पति देव से थर-थर कांपती कृष्णा और उसके दो बड़े हो रहे बच्चों के जीवन में एक संवेदनशील किन्तु ” अपनों” के लिए साम,दाम, दण्ड, भेद के प्रयोग से भी गुरेज न करने वाले प्रभावी राजनेता राघव का अप्रत्याशित रूप से आगमन होगा ?
तब क्या चाहत और क्या भूमिका होगी कृष्णा के पति देव की ,कृष्णा से और राघव से ?…और कैसे कृष्णा अपने पति एवं पूर्व प्रेमी के मध्य सामंजस्य बनाते हुए स्त्रीत्व धर्म का पालन कर सकेगी ? क्या होगा तीनों की उन ख्वाहिशों का जो अनायास ही आपस में गुत्थम-गुत्था हो रही ?
उपन्यास पढ़ते समय ऐसे अनेक प्रश्न पाठक के मन में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं । जिनका उत्तर पाने को लालायित वह उपन्यास के कथानक से बंधता चला जाता है और जब उसे अपने मन में उठ रहे प्रश्नों का जवाब मिलता है तो वह सुखद आश्चर्य से भर मुस्कुरा उठता है क्योंकि – “ख्वाहिशें अपनी-अपनी ” उपन्यास के कथा-शिल्प की बुनावट है ही इतनी गसी हुई। लगता है जैसे – इस उपन्यास के सभी किरदार पाठक के जेहन में जीवंत होकर साथ-साथ चलते हैं। यही उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता भी है।
इसमें लेखिका ने मानवीय गुण-दोषों के साथ अतीत,वर्तमान और भविष्य की परिस्थितियों का जो भावनात्मक संयोजन चित्रित किया है वह काल्पनिक होते हुए भी यथार्थ को गढ़ता, प्रतीत होता है और धीरे-धीरे अंत की ओर बढ़ते हुए यही कारक भी बनता है अपनी अपनी ख्वाहिशों को मंजिल तक पहुंचाने का।
…अलावा इसके , एक बात और । इस उपन्यास की लेखिका ने राजनीतिक दांव-पेंच को इतनी बारीकियों से उकेरा है कि कभी -कभी तो यह भ्रम हो जाता है कि कहीं लेखिका भी राजनेता तो नही! मगर यह सत्य नही है। लेखिका ,पत्रकार भी है । एक पत्रकार यह सब जानता-बूझता तो है मगर इतनी गहराई से जानने-बूझने और उसे यथेष्ठ संवाद के रुप मे अभिव्यक्त करने की कला कोई मनो-विश्लेषक ही कर सकता है। इस दृष्टि से भी लेखिका ने अपनी योग्यताओं का पूरा कौशल इस उपन्यास में उंडेल दिया है जो काबिले-तारीफ बन पड़ा है।
इसलिए आलोचना पक्ष पर क्या लिखूं ? आलोचना जैसा कुछ मिला ही नही। हम -सबके जीवन में ख्वाहिशें होती हैं । उन्हें हम पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। फिर चाहे वह नीति से हो या अनीति से।
…लेकिन इस नीति-अनीति के धर्मयुद्ध में जब स्वहित की भावनाओं के साथ मानवीय मूल्य भी शामिल हों तो फिर परिणाम स्वीकार्य ही होते हैं । जैसा इस उपन्यास के अंत में हुआ।
…क्या हुआ होगा ? अब इसे जानने,समझने के लिए पढ़ना तो होगा ही ,आपको । तभी सार्थकता होगी – “ख्वाहिशें अपनी-अपनी ” की भी।
सार रूप में सिर्फ इतना ही कहूंगा – इस उपन्यास के किरदार हम सब के आस-पास कहीं न कहीं रचे-बसे हुए हैं। फ़र्क है तो बस,रूप-स्वरूप के बदलाव का।

– देवेन्द्र सोनी
इटारसी।

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