काव्य : सखि कैसा वसन्त हम ले आये – कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ लखनऊ

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सखि कैसा वसन्त हम ले आये

सखि कैसा वसन्त हम ले आये,
वन, बाग, बगीचे कहाँ गये,
उपवन उद्यान हमारे होते थे,
सखि सारे के सारे कहाँ गये।
सखि कैसा वसन्त…

कहाँ गईं अमवा की डालें,
कोयलियाँ कू कू कहाँ सुनायें,
भौरों की गुन-गुन नहीं गूँजती,
चातक पपीहा के बोल नहीं सुनें।
सखि कैसा वसन्त…

पीपल, पाकर, वटवृक्ष नहीं,
महुआ, जामुन, अमरूद नहीं,
शीशम, साख़ौ, शाल, नीम नहीं,
गुड़हल, अनार, कचनार नहीं।
सखि कैसा वसन्त…

मिट गई गाँव की वो बस्ती,
मिट गईं देहाती सब पहचानें,
गाँव की गलियों गलियारों को,
पगडंडी सी राहों को कौन जाने।
सखि कैसा वसन्त…

कैसा वसन्त है अब आया,
मधुमास नहीं पतझड़ लाया,
प्रकृति पर पड़े खो जाने के साये,
आदित्य जड़ चेतन को क्या भाये।
सखि कैसा वसन्त…

कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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