काव्य : ग़ज़ल – निर्मल नदीम जौनपुर

ग़ज़ल

इसमें मेरी ही नहीं तेरी भी रुसवाई है,
वरना क्या नाम न लेने की क़सम खाई है।

नोचती रहती है वहशत जो कलेजा शब भर,
क़ैस के हिस्से में आई हुई लैलाई है।

देख पाए न उसे जलवा फ़िशां होते हुए,
ये मोहब्बत नहीं नाकामी ए बीनाई है।

मेरी पलकों पे जो छाले हैं सनद देते हैं,
मेरी आँखों में जो दरिया है वो सहराई है।

कहने सुनने को कई क़िस्से हैं मशहूर मगर,
इक तमन्ना ही दो आलम की तमाशाई है।

बर्क़ गिरने से बुझी आग गुलिस्तानों की,
यानी इस दिल की दवा यार की अंगड़ाई है।

ज़र्रे ज़र्रे ने अगर तुझसे शरारे मांगे,
क्या बुरा है कि मेरा दिल भी तमन्नाई है।

अपना हर तार ए नफ़स छेड़ता रहता है नदीम,
ये कोई खेल नहीं इश्क़ की भरपाई है।

निर्मल नदीम
जौनपुर