हम और हमारा गणतंत्र–कल, आज और कल – पद्मा मिश्रा जमशेदपुर झारखंड

हम और हमारा गणतंत्र–कल, आज और कल

बलिदानों की तप्त धरा पर, शोभित है गणतंत्र हमारा, संघर्षों के उच्च शिखर पर, गूंजा है जयहिंद का नारा

हमारा गणतंत्र हमारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता का ,देश की अस्मिता का प्रतीक है,इसकी गौरवशाली परम्पराओं और इतिहास ने विश्व के सम्मुख एक अनुपम उदाहरण भी प्रस्तुत किया है कि संघर्ष चाहे कितना भी प्रबल हो, संकल्पों में दृढ़ता हो तो हर कठिन लक्ष्य भी सरलता से प्राप्त किया जा सकता है,,हमारी मातृभूमि भारत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन की गुलाम रही जिसके दौरान भारतीय लोग ब्रिटिश शासन द्वारा बनाये गये कानूनों को मानने के लिये मजबूर थे, भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लंबे संघर्ष के बाद अंतत: 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली, लगभग ढाई साल बाद भारत ने अपना संविधान लागू किया और खुद को लोकतांत्रिक गणराज्य के रुप में घोषित किया,, लगभग 2 साल 11 महीने और 18 दिनों के बाद 26 जनवरी 1950 को हमारी संसद द्वारा भारतीय संविधान को पास किया गया। खुद को संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्य घोषित करने के साथ ही भारत के लोगों द्वारा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाया जाने लगा,, परंतयह सब प्रयत्न इतना सरल और सहज नहीं था, एक विशाल साम्राज्य के क्रूर हाथों से भारत की आत्मा को मुक्त कराना,, बिना किसी सैन्य बल और मानसिक मजबूती के साथ इस लडाई को जीत पाना दुर्लभ था,, लेकिन जहां देशभक्ति और स्वाभिमान का प्रश्न हो,भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने का आह्वान हो, वहां युवाओं, बच्चों, और अदम्य साहस से भरे देशभक्त नेताओं को कोई बाधा, कोई चुनौती हरा नहीं सकती थी,, लोग देश के लिए मर मिटने को भी तैयार थे,, राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी जी ने लिखा था**मुझे तोड़ लेना वनमाली,उस पथ पर देना तुम फेंक,,मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,जिस पथ जाएं वीर अनेक**हमारे गौरवपूर्ण राष्ट्रीय पर्व ने वर्षों का लंबा सफर तय किया है,, चुनौतियों को जीता है, बाधाओं का सामना किया है और आज एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य के रुप में विश्व के सामने एक विजेता की तरह खड़ा है,,,

चल पड़े जिधर दो डग मग में ,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर ,
पद गई जिधर भी एक दृष्टि ,

गड़ गए कोटि दृग उसी ओर ”यह पंक्तियाँ बापू के लिए लिखी गईं थी जिनके एक आह्वान पर पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा था ,करोड़ों हाथों ने उनका हाथ थाम स्वदेश की स्वतंत्रता के पथ पर अपने असंख्य पग बढ़ा दिए थे –यही है हमारा गणतंत्र -हमारी आत्मा ,हमारा गौरव , जो हमें शक्ति देता है,और पहचान भी ….क्योंकि – गणतंत्र किसी भी देश का ह्रदय है जहाँ विश्वास ,निष्ठां, और उसमे अन्तर्निहित आस्था ही धडकनें हैं,जिनसे कोई देश जीवित रहता है, सांसें लेता है ,..चाहे कितने भी तूफान आयें- आंधियां चले ,पर जब तक हमारी आस्था अपने लोकतंत्र -गणतन्त्र में है ,हम किसी भी , विपत्ति ,संघर्ष का सामना कर पाने में सक्षम रहे हैं ,समय ने अनेक बार करवटें लीं, सामाजिक ,दैवी, आपदाएं हों या बाह्य आक्रमण रहे हों या आतंकवादी क्रूर घटनाएँ रही हों हम डरे नहीं क्योंकि हमारे साथ करोड़ों हाथ थे, करोड़ों का विश्वास था ,हमारी एकता थी ,जिसने डट कर हर चुनौती का सामना किया ,हम अन्याय व् क्रूरता का जवाब देना भी जानते हैं पर मानवता में अपने अटूट विश्वास से डिगना नहीं चाहते,अभी हाल में अपने सैनिकों की क्रूर हत्याओं के दोषी पडोसी देश द्वारा मांगी गई क्षमा का कोई महत्त्व नहीं क्योंकि दिनकर जी ने कहा था–

क्षमा शोभती उस भुजंग को ,
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन ,
विषहीन ,विनीत ,सरल हो
युद्ध सदैव विनाश लाता है ।

उसका केवल ध्येय ध्वंश हो मानवता का ,मनुज जहाँ भी हो -यम का आहार हो ” पर जब शत्रु सामने खड़ा ललकार रहा हो तब उसका जवाब देना भी हमारे सैनिकों को आता है क्योंकि -,हम जानते हैं कि , हमारी आवाज दबाई नहीं जा सकती ,देर से ही सही पर न्याय जरुर होगा, अपनी न्यायव्यवस्था में हमारा अटूट विश्वास हमें टूटने नहीं देगा ,हम एक गणतांत्रिक व्यवस्था के अंग हैं ,अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व् मर्यादा की मुखर आवाज बन कर सत्ता के सिंहासन पर बैठे किसी अयोग्य को हटा पाने का अधिकार भी हमारे पास है –दो राह समय के रथ का घर घर नाद सुनो–सिंहासन खाली करो कि आती है,” ”शायद संघर्ष के थपेड़ों से गुजर कर भी अपने गणतंत्रके प्रति हमारी आस्थाही हमें और भी मजबूत बनातीहै, हमारी अनेकता में एकता की भावना को बलवती बनाती है -परतु प्रश्न यह भी उठता है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी में अपने गणतंत्र और उसके प्रति निष्ठा में कमी आई है,, उनके लिए कोई भी राष्ट्रीय पर्व देश की गरिमा,एकता और अखंडता का प्रतीक कम एक निश्चित अवकाश का दिन बनकर रह गया है,, एक समूची पीढ़ी गहरे अवसाद और आक्रोश में जी रही है, जिसके मन में विद्रोह है, पश्चिमी सभ्यता का आकर्षण है, और छद्म आधुनिकता और धर्म निरपेक्षता का खुला हुआ अनर्गल विकल्प हैं, जहां उनका भविष्य उलझ कर रह गया है,,हमने अपने बचपन में जिस गणतंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास का भाव संजोया था वह आज कहीं कम ही नजर आता है,,*

जब गणतंत्र दिवस सचमुच हमारे लिए वंदनीय था,, एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय त्योहार था,जिसका स्वागत और आदर हम दिल से करते थे

गणतंत्र दिवस मेरे बचपन के प्रिय त्योहारो में से एक रहा है,, एक सुनहला सपना देखने के बाद होने वाली सुखद भोर की कल्पना आज भी मन को छू लेती है,,, स्वतंत्रता सेनानी दादाजी ने हमें हमेशा इन पर्वों का आदर करना सिखाया था,,, देशभक्तों की अनगिनत कहानियां सुनाई थी,, और हम कभी गांधी जी की मृत्यु तो कभी भगतसिंह की फांसी पर ऱो पड़ते थे,,उस समय हम बच्चों के लिए रात काटनी मुश्किल हो जाती थी,, सुबह उठते ही ढेरों काम, तैयारियां,,रात भर जागकर रंगीन कागज की बनी झंडियां ‌‌‌‌‌यहआ वहां पूरे घर आंगन में फैला कर कागज चिपकाया करते थे,,सफेद लकदक कपड़े, तिरंगे झंडे,सब देखभाल कर तैयार करते तब कहीं जाकर रात बारह बजे तक सो पाते थे,,,उस समय हमारा बचपन सामाजिक राजनीतिक छल छंदों, और दांव-पेंच की बातों को नहीं समझ पाता था,,बस यह हमारा देश है,,,गांधी, नेहरू सुभाष भगतसिंह सभी अपने हैं,,उनका आदर सम्मान भी था मन में,,, परंतु वर्षों बीत गए, उम्र के अनेक पड़ावों से गुजर कर, उच्च शिक्षा के गलियारों को पार करते हुए भी फिर कभी बचपन जैसे स्वतंत्रता दिवस नहीं मना पाए हम,,सब कुछ यादों में कैद,,,

एक नई सुबह-जागृति की, विश्वास की,एकता व् गर्व-बोध से भरे गणतंत्र की,–हाथों में तिरंगे झंडे उठाये हजारों बच्चों की एक सम्मिलित आवाज —”भारत माता की जय !,-छब्बीस जनवरीअमर रहे !”–युवा उमंग और जोश भरे स्वर —”आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की,इस मिट्टी से तिलक ,करो,ये धरती है बलिदान की ”–बचपन में राष्ट्रीय उत्सव की यह तस्वीर मेरे सपनो में कैद है —पर समय के बदलते परिदृश्य में यह तस्वीर धीरे धीरे बदल रही है,–अपने प्रिय कवि नीरज जो पंक्तियाँ मुझे अतयंत प्रिय थीं –””सागर चरण पखारे -गंगा शीश चढ़ाये नीर ,मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर -तुझको या तेरे नदीश गिरी-वन को नमन करूँ,-किसको नमन करूँ मैं भारत किसको नमन करूँ -पंक्तियों को कभी शान से गुनगुनाते गर्व का अनुभव होता था पर अब उमंग उत्साह की हिलोरें पहले जैसी नहीं रही युवा मन में -देशभक्ति व् देश के प्रति समर्पण बोध आज भी है,भारत माँ आज भी वंदनीया है ,परन्तु आज जन-मन की भावनाएं कहीं आहत हो गईं हैं, आज बहुत याद करतीं हूं वह बचपन की पवित्र भावना,जब हम पूरे मन से ,भारत माता अमर रहे**हिन्दुस्तान जिंदाबाद*के नारे लगाया करते थे,,आज तो हम सबके लिए स्वतत्रता दिवस मात्र एक छुट्टी का दिन है,पूरे दिन आराम करना है, मनपसंद चीजें खाने का दिन है,, बहुत हुआ तो टीवी पर प्रधानमंत्री जी को झंडा फहराते देख लेते हैं,, जन-गण-मन गीत खड़े होकर गा लेते हैं,बस यही भावना शेष रह गई है आज की पीढ़ी,परिवैश में,, ईश्वर से प्रार्थना है,, और मेरा मन आज भी यही चाहता है ** कि कब वो दिन आए जब हम अपने राष्ट्रीय त्योहारो को भी उतनी ही धूमधाम से मनाते, जैसे होली या दीवाली,,, देशभक्ति के गीत फिर फिजाओं में गूंजते,,काश, ऐसे ही हो,जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम!!

पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर झारखंड