काव्य : सर्वत्र रमंते इति राम – महिमा शुक्ला, इंदौर.

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सर्वत्र रमंते इति राम

राम नाम

बोलो – राम कहाँ नहीं बसते,?
कैसे -कहाँ – कब कोई ढूँढे गा?
वे तो बसते– हैं —
मन में, मंदिर में,घट -घट में
हर वृत्ति, प्रवृत्ति और प्रकृति में
हर कण -कण, प्रण -प्राण में
जल- थल- नभ और समग्र में,
घट- घट ,घाट- घात आघात में
तुम में,मुझे में,हम सबमें- बसते हैं रामरे
मन,वचन,कर्म के संकल्प में
तप -जप, ताप- जाप और त्याग में
नीति -नियम- मर्यादा की सीख राम नाम में
राज -काज का स्वरूप है रामराज में,
धर्म, सत्कर्म- मर्यादा निहित हैं राम के वचन में
लोक कल्याण और लोकमत भी रक्षित है राम राज में
दीन-हीन,जात प्रजात हों या जीव जंतु कोई प्राणी
सबके साथी – रक्षक राजा राम हैं
शक्तिमान हों या शक्तिहीन या हो नर – नारी
सबके त्राता राम हैं,
जीवन के हर सुख– दुःख के पल में
अभय – आश्रय देते राम हैं
जीवन -मरण के चक्र के तारक राम हैं,
राम मात्र नाम नहीं,व्यक्ति नहीं -राजा नहीं
राम नाम तो सु मन्त्र है
राम- राम -राम -राम का नाम रे रे ।

महिमा शुक्ला,
इंदौर.

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