मकर संक्रांति का महत्व – सरला मेहता इंदौर

मकर संक्रांति का महत्व

भारत के विभिन्न त्योहारों में से, विशेषकर ज्योतिष विज्ञान पर आधारित, मकर संक्रांति एक है। इस दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है और पृथ्वी के सबसे निकट होता है। धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश से यही नाम रखा गया।
ऋतु परिवर्तन का संधिकाल अर्थात जाड़े की विदाई व ग्रीष्मा रानी का आगमन। पौष माह से माघ में प्रवेश। अमूमन यह चौदह जनवरी को आता है किंतु कभी-कभी मौसम परिवर्तन से तेरह या पँद्रह जनवरी को भी पड़ जाता है।
पंजाब में यह लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। ज्वार मक्का की धानी, सिके चने व मुमफली जैसे चना-चबीना,बीच में आग जलाकर बाँटते व खाते हैं।
दक्षिण में केरल व कर्नाटक में संक्रांति तथा तमिलनाडु में पोंगल मनाते हैं, नई फ़सल के उपलक्ष में। सुंदर फूलों आदि से रांगोळी बना पूजा-नृत्य करते हैं। घरों में नए अनाज की खाद्य सामग्री बनती है।
मध्य व उत्तर भारत में संक्रांति ही कहते हैं। तिल का बड़ा महत्व है। इस दिन से तिल के बराबर दिन घटता व रात्रि बड़ी होती जाती है।
तिल, गुड़ या शकर, मेवा, खोपरा व मुमफली दानों से विभिन्न व्यंजन बनाए जाते हैं। लड्डू, बर्फ़ी, चिक्की,गज़क आदि। झारखंड, बिहार आदि में चांवल के पकवान भी बनते हैं। यूँ तो मौसम अनुसार खीर, गाज़र-हलवा आदि भी बनाते हैं। तरह-तरह के लड्डू बनाने का रिवाज़ भी है।
लोग प्रातः स्नान कर सूर्य व अन्य देवों की पूजा करते हैं। सेवक-सेविकाओं को खिचड़ी, तिल लड्डू, वस्त्र, रुपए का दान करते हैं । घर के सामने लेकर बैठ जाते हैं। और जो मांगने आते हैं , उन्हें श्रद्धा से देते हैं। कहते हैं महादेव ने नारायण को भी ज्ञान का दान दिया था। सुहागिनें कोई भी चौदह वस्तुएँ व सुहाग का सामान बाँटती हैं। घर में खिचड़ी ज़रूर बनती है। खिचड़ी यानी एकरसता का प्रतीक। मंगौड़े , पौष माह का पेट फोड़ने के नाम पर बनाते हैं। स्त्रियों को सपरिवार मायके में न्यौता जाता है।
महाराष्ट्रियन जन तिल से चिरौंजी जैसे दाने भी बनाते हैं,जिसे हलवा कहते हैं। नवविवाहित युवती व घर के नए बच्चे का इससे श्रृंगार करते हैं।
हल्दी-कुमकुम का कार्यक्रम चौदह दिनों तक चलता है। अर्थात इस बहाने अच्छा खासा मिलन-समारोह हो जाता है। यह सब हमारे भारत में खूब होता है। मराठी में कहते हैं…तिल गुड़ घ्ये, गोळ गोळ बोळ।
इस दिन पवित्र नदियों में
स्नान का भी महत्व है। गंगा, यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा आदि के घाटों पर श्रद्धालुओं का मेला लग जाता है। शनि देव व सूर्यदेव को शांत करने के लिए नदी में डुबकी लगाते हैं।
ओह !!! बच्चे-बड़े सबका मुख्य आकर्षण तो भूल ही गई थी। जी हाँ, गुल्ली डंडा व पतंगबाज़ी। म्हारो गुजरात को आसमान तो दिखे ज नी… बस रंग बिरँगी पतंग ही पतंग।
तो साथियों तिल-गुड़ खाइए और सेहत बनाइए। नमस्कार।

सरला मेहता
इंदौर