काव्य : अधजगी भोर – बिन्दु त्रिपाठी भोपाल

अधजगी भोर

आधी जागी सी, आधी सोई सी,
फिर हुई आज अधजगी भोर।
उधर कुहासा श्वेत वसन में,
सूरज ढक कर सोया है।
इधर अधूरी सुबह जगी है,
कंबल ओढ़ अमीर सोया है।
क्या करे किसान मजदूर बेचारा,
उसका तो शायद भाग्य सोया है।
घना कुहासा छाया फिर भी,
चल पड़ा अधजगी भोर में,
रोजी रोटी का सवाल है,
कैसे कर सोये भोर में।
खेतों को पानी है देना,
मजदूरी कर परिवार पालना,
उसकी किस्मत में कहाँ लिखा है,
अधजगी भोर में सोते रहना।
घर में बूढ़ी माँ भी है जो,
खाँस खाँस कर मरती है।
नन्हें छौने को गोद में लेकर,
पत्नी पानी भरती है ।
कहाँ किसान मजदूर की खातिर,
अधजगी भोर सुख लाती है।
वैभव के मारों को हर दिन,
हर भोर विभोर कर जाती हैं।

बिन्दु त्रिपाठी
भोपाल