काव्य : ग़ज़ल – वैभव असद अकबराबादी आगरा

ग़ज़ल

सब से मुमकिन नहीं निबाह बने
हम बड़ी मुश्किलों से शाह बने

तू जो हँस दे तो हँस पड़े कलियाँ
ज़ख़्म छू ले तो दर्द आह बने

जाने कैसे शजर मिले मुझको
छांव किसकी मेरी पनाह बने

उसके लब लब नहीं दो मिसरे हैं
लिखने वाले की वाह वाह बने

मुझको रोते भी देख ले कोई
काश इसका कोई गवाह बने

मर गए हैं जिधर जिधर आशिक़
दिल के मारों की जश्न गाह बने

पांव से उसके है ज़मीं सब्ज़ा
वो चले जिस तरफ़ भी राह बने

कारखाना है दिल का बंद ‘असद’
कोई आए तो इसमें चाह बने

वैभव असद अकबराबादी
आगरा

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