वैचारिक चिंतन : संस्कार – उषा सक्सेना भोपाल

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वैचारिक चिंतन:-संस्कार

जिसकी जो आदत होती उसे वह मृत्यु के समय तक नही त्याग पाता ।यह उसका जन्मगत स्वाभाव होता है । जिससे वह चाह कर भी
नही उबर पाता ।
जाके जौन सुभाय जायें नही जी से
नीम न मीठे होंय खांयें गुड़ घी से ।
सत्य है ।
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह न अच्छा होता है और न बुरा ।जन्म के पश्चात हीउसका शुद्धिकरण करने के लिये उसे संस्कारित किया जाता है ।शिशु को संस्कार देने के लिये उसकी प्रथम गुरु माता होती है जो उसे अपनी ममता के आंचल में पाल कर अपने दूधके साथ ही संस्कारों की घुट्टी घोंट कर पिलाती। है ।धीरे धीरे जब वह बड़ा होता है तो पिता उसे अनुशासन की शिक्षा देता है ।
परिववार शिष्टाचार आचार व्यवहार की शिक्षा देने वाली प्रथम पाठशाला तब कहीं बड़ा होने पर समाज और शिक्षा के लिये विद्यालय के गुरु उसको ज्ञान और आचार व्यवहार की शिक्षा देते हैं ।इसप्रकार अनेक संसस्कारोंसे सुसंस्कृत होकर ही वह बाहर आता है एक संस्कार नागरिक बन कर ।
संस्कार का अर्थ है अच्छा नैतिकता और नैतिक मूल्यों की संस्कृति के द्वारा परिशोधित कर अभिषिक्त पवित्रता जिसको धारण करने के पश्चात ही व्यक्ति संस्कारवान बनता है ।अच्छे संस्कारों में शिष्टाचार पूर्ण आचरण प्रमुख है ।
व्यक्ति की विनम्रता और शालीनता ही उसे समाज में प्रतिष्ठा दिलाती है । एक दूसरे के प्रति सहयोग की भावना सहानुभूति और सभी के प्रति सद्भावना संस्कार की नींव के मूल आधार है तो उससे उत्पन्न संस्कृति उसकी मर्यादा और गरिमा है जिसके द्वारा व्यक्ति समाज में अपना स्थान पाता है ।
आज इन्हीं संस्कारों की कमी के कारण मानव स्वभाव में उच्छृंखलता आ रही है जो उसे समाज से पृथक कर व्यक्ति वाद के भौतिक सुखवाद की ले जारही ।आज हम मानव संस्कृति के मूल आधार से भटक रहे हैं यही हमारे पतन का मूल कारण है ।जहां पर सामाजिक मर्यादाओं का खुल्लम खुल्ला उल्लंचन हो रहा और हम किंकर्तव्य विमूढ़ होकर मूक दर्शक की तरह बैठे
यह विच्छृंखलन देख रहे ।

उषा सक्सेना
भोपाल

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