बिलासपुर से परीक्षित शर्मा की कविता – मैं हमेशा से अव्यक्त रहा

मैं हमेशा से अव्यक्त रहा
खुद को बता सकने का बोझ, हमेशा से मुझपर रहा है !

जिंदगी में मैंने जब से हथेलियों को देखना शुरू किया है
एक अज्ञात नदी और जरा सी ऊष्मा
का हमेशा से ऋणी रहा हूँ !

मैं अलविदा के उन हाथों जैसा रहा
जो धीमे धीमे झुकते हैं !

उस तस्वीर जैसा,
जो धीरे धीरे धुँधली पड़ती हैं !

उन शब्दों जैसा,
जो धीरे धीरे भारी होते हैं !

उन वाक्यों जैसा,
जो पूरा होने के बावजूद भी अर्थहीन रह जाते हैं !

इस जीवन को मैने उस पेड़ की तरह सींचा है
जिसके बीज ठीक उसी पेड़ को जन्म दिया करते हैं !

मैं हमेशा से चाहता हूँ
इसकी छाँव में देर तलक बैठना

अतीत की हर स्मृतियों को देख पाना
अबतक का मेरा अंतिम सपना रहा है !

सालों से मैं खुद का पीछा करते करते
लौट आता हूँ उन्ही रास्तों पर,
जहाँ से हज़ारों रास्ते निकलते हैं !

उलझनों से बचकर
हमेशा दीवारों की ओट में रहता आया हूँ
छिपने की कला मैंने इसी से सीखी है !

सबसे छिपकर मैंने हमेशा एक व्यर्थ कोशिश की
ताकि लिख सकूँ किसी रोज़ एक ” खूबसूरत कविता ”
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-परीक्षित ‘पुरान’
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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