अहमदाबाद से हेमलता रावल की कविता – पैसा

पैसा

पैसा, पैसा, पैसा
आतंक मचा है कैसा,
इस कागज के टुकड़े ने
खोखला कर दिया है रिश्तों को,
परिभाषा ही बदल गई है परिवार की,
पैसों के लिए भाई भाई में द्वेष है
बेटा माँ बाप से दुर है,
ना ही कृष्ण सुदामा सी दोस्ती है
और न राम जैसा त्याग,
जहां पहली जरूरत प्यार हुआ करती थी,
आज वही प्यार पैसों में तब्दील हैं
धनलोलुपता के आगोश में,
कुछ इस तरह मदमस्त है
न अपनों की पहचान है
और न ही मान सम्मान
सुना है, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं
जहाँ ये पैसा आम आदमी की जरूरत है,
दूसरी ओर यहीं पैसा
अमीरी गरीबी का भेद बताता है,
कहीं भूखे को भोजन कराता है तो,
कहीं जुएं और शराब जैसी लत लगाता है
पैसों के मायाजाल में
भूला भटका प्राणी शायद भूल रहा है,
पैसा हमें नहीं बल्कि
हम पैसे को कमाते हैं।

– हेमलता रावल
अहमदाबाद

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