गाजियाबाद से डॉ. रश्मि दुबे की गजल

गजल

अब कहां रस्म घर लुटाने की
दिल लुटाने की जां लुटाने की

प्यार से उनके पास जो बैठे
कोशीशें हैं ये दिल लगाने की

दो कदम आगे ही बढ़े थे हम
सूरतें हो चलीं मनाने की

आज दस्तूर है ज़माने का
कोशिशें ही रहीं जलाने की

सोच कर इश्क अब किया कीजे
अब न फितरत रही निभाने की

इस कदर दाग़दार है रिश्ता
अभ न ख्वाहिश रही बढ़ाने की

मिल गया जब तुम्हारा ये आंचल
है न जरूरत शामियाने की

डॉ. रश्मि दुबे
गाजियाबाद

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