सिलीगुड़ी से रूबी प्रसाद की कविता – नि:शब्द कर गये तुम

नि:शब्द कर गये तुम

ए जिंदगी____
सिखा के जीने के हुनर को,
नि:शब्द कर गये तुम !!
छोटे थे जब बचपने में खुल कर जिया हमने तुझे ,
बड़े क्या हुए हम भूल गये बचपना__
ऐ जिन्दगी __
जीवन की सच्चाई दिखा कर हमें _
निशब्द कर गये तुम !!
हर तरफ__
भीड़ भी बहुत थी और थी एक खामोशी भी,
बेटियां भी थी और थी बैचेनी भी __
रिश्ते थे बस मतलब के,
थी हर तरफ जिस्म और दौलत की बारिश भी __
मां बाप के अलावा ,
नहीं की किसी ने एक पल मोहब्बत भी !!
झूठे इस संसार में,
सिखाया तुमने हुनर मुझे जीने का__
सुख और दुख के तोहफों से मालामाल कर,
उतार और चढ़ाव के दंश को झेलने का __
सबक सिखा मुझे ,
हौसला मंद और निडर बनाया !
हां हर कदम पर हर हाल में,
जिना सिखा__
तुने मुझे ,
ऐ जिन्दगी,खुद से मिला,
नि:शब्द कर गये तुम _
नि:शब्द कर गये तुम !!

रुबी प्रसाद
सिलीगुड़ी

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