लखनऊ से शकुंतला श्रीवास्तव की कविता – तूफानों में दीप

तुफानो में दीप

तूफानों में एक छोटा सा
दीप जलाये बैठे हैं
साथी मेरे कब आओगे
आस लगाए बैठे हैं
घोर अंधेरा अधंकार है
कुछ नहीं सुहाता है
हम अपनी कश्ती को
तूफानों में उतारे बैठे हैं
दूर किनारों से फिरभी
मौजो के सहारे बैठे हैं
पहुँचेगी एक रोज किनारे
आस लगाए बैठे हैं
साथी मेरे कब आओगे
आस लगाए बैठे हैं

स्वरचित
शकुंतला श्रीवास्तव
(लखनऊ उत्तर प्रदेश)

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