पटना से राजीव रंजन शुक्ल की कविता – आज का युग

आज का युग

आइये घटनाओं की चश्मे से देखते है आज का युग,
बड़े बुजुर्ग कह गए है शायद यही है कलियुग ।
पूजनीय माँ’ और जीवित पिता को भेजा जा रहा है वृद्धा निवास,
अच्छी बात बताने वाले का किया जा रहा है उपहास।
अभिवादन की देखो बदल रही है शैली,
प्रणाम की जगह ‘’हैलो’’ और बिना दुख के ही हाय, हाय बोलने की यह अबूझ पहेली ।
हिन्दी बोलने वाले को समझा जा रहा गवार ,
अंग्रेजी मे ‘या’ ‘या’ करने वाले माने जा रहे है होशियार ।
लड़के और लड़कीयॉ हो गए गाइज और गैल,
सुनकर इसे खुश हो रहे गाय और बैल।
समाज मे अश्लीलता और असभ्यता पड़ोस रहे कई रियालिटी कार्यक्रम,
अश्लील और असभ्य मज़ाक पर गर्दन झुका रहे है हम ।
पहले देखते ही मुहल्ले के मामा और चच्चा ,
पीते हुए सिगरेट बुझा देता था बिगरा बच्चा ।
अब तो स्वयं ही बुजुर्ग बदल देते है रास्ते,
क्योकि सिगरेट के धुओं के छल्ले मुँह पर छोड चल देते है वे हॅसते हॅसते।
आज हम हर रिश्ते को अर्थ मे तौलते है ,
इसीलिए प्यार के बदले पैसा पैसा बोलते है।
भवनों और अट्टालिकाओं मे है सिर्फ मानव शरीर,
आज सिर्फ धन उपार्जन मे ही लगी है लोगों की भीड़ ।
पास है हमारे है टीवी , मोबाइल, स्मार्ट फोन और फ्रिज ,
ब्रांडेड सामानों की सजी है आलमीरा मे सीरीज।
लेकिन हमने कर दिये है आज हर रिश्ते और संबंधो को फ्रिज,
बच्चों की बचपना गयी,
गई चाचा , मामा , फूफा मौसा, मौसी और ताई ।
बच्चे अब खेल रहे है कलेश औफ़ क्लेन और मिनी मिलिसिया का खेल,
पारिवारिक परिवेश से न होती इनकी मेल।
अखबारों और चैनलों मे प्राय: आती है ब्रेकिंग न्यूज ,
बेटों ने माँ- बाप को,और चाचा ने ही भतीजों को धन के लिए किया है उन्हे फ्यूज ।
आज शिक्षकों ने शिष्याओं तथा अपनों ने ही अपनो पर डाली है बुरी नजर ,
बन जाती है आज की यह बड़ी खबर ।
लोग कर रहे घोटाले पर घोटाला ,
लेकिन फिर भी चुना जा रहा है उन्ही मे से अपना नेतृत्व करनेवाला।
सावधान, भाइयों बदल रहा है परिवेश ,
भ्रष्टाचारी, बलात्कारी और दुराचारी बदल रहा है भेष।
हत्या , लूट और डकैती की नहीं होती है चर्चा ,
मजबूर है हम इतना की ईमानदारी पर ही करनी पर रही परिचर्चा ।
पर्यावरण बिगाडकर मनाते है इसका दिवस,
दुर्भावना फैलाकर सद्भावना दिवस मनाने को है हम विवश ।
गूगल अर्थ से देख रहे है हम समस्तव विश्व,
लेकिन हम भूल रहे की खतरे मे है हमारा सांस्कृतिक आस्तित्व।
आज हर रिश्ते और संबंधो को गए है हम भूल,
लेकिन फेसबुक फ्रेंड लिस्ट से है हमारा फूल।
ट्विटर , फेसबुक और वाट्सअप पर मैसेज करते तुरंत,
लेकिन आपस मे मिलने की परंपरा का हो रहा लगभग अंत ।
अंत मे नौजवानो से करता हूँ अनुरोध ,
बुजुर्गो की भावनाओं और अनुभवो का करे न हम विरोध ।
इन्हे इतिहास मान कर इतिहास न बदलों ,
क्योकि तुम्हें भी होना है इतिहास तुम समझ लो ।

(स्वरचित) राजीव रंजन शुक्ल
पटना ,बिहार

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21 Comments

  1. आज के परिपेक्ष में बिल्कुल सटीक। कविवर महोदय आप ने इस युग का सही चित्रण किया। हरेक लाइन में ग़हरी संवेदना है। परिवर्तन के दुष्परिणाम के प्रति चिन्तन एवं सचेत रहने की आग्रह है। आगे भी इस तरह की रचना की इंतजार रहेगा।

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