चेन्नई से शशिभूषण मिश्र की गजल

आजकल हर दिन इंटरनेट एवं आभासी दुनिया पर हजारों लोग ठगी का शिकार हो रहे हैं ।इसी बात को मूल में रखकर लिखी यह गज़ल –

कुछ खुलकर आ जाते हैं कुछ वक्त़ लगाते हैं,
छलते हैं दोनों जीवन अभिशप्त बनाते हैं,

निर्विकार रहकर ही इनसे संभव है बचना,
आभासी दुनिया का ख़ुद को भक्त बताते हैं,

लेकर आते हैं सपनों की ये अजीब दुनिया,
हो जाता दिल बेवश मन उन्मत्त बनाते हैं,

आसमान में उड़ा परिंदा चाहत ले दिल की,
कुछ दाना चुगते हैं कुछ को रक्त लुभाते हैं,

बंजारों सी हुई जिंदगी बुनते अफ़साना ,
जहाँ जरूरत होती पूरी घर बस जाते हैं,

बादशाह सा जीते जीवन जो गुनाह करके,
जीवन रेखा को यूँ ही बेवक्त़ मिटाते हैं,

सिर्फ सोचते रहते अपनी, अपनों की खातिर,
जनता को छलते हैं ताज-ओ-तख्त़ दिखाते हैं,

आडम्बर में रोज़ फाँसते ये बाबा बनकर,
छद्मवेष वेषधारी बनकर हर वक्त़ लुभाते हैं,

भक्तों को ये दिखलाते हैं चमत्कार ‘गुंजन’,
कदम कदम पर पहरेदारी सख्त़ लगाते हैं,

– शशि भूषण मिश्र ‘गुंजन’
चेन्नई

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1 Comment

  1. आदरणीय देवेन्द्र सोनी जी संपादक युवा प्रवर्तक को हृदयतल से अनंत आभार ।आपने मेरी रचना को स्थान एवं सम्मान देकर कृतार्थ किया है ।

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