प्रतापगढ से कोमल मिश्रा की रचना

अंशुमाली तिमिर जब निगलने लगे ।
पीर हिम श्रृंखला के पिघलने लगे ।।

भोर गाने लगी गुनगुनाने लगी ।
ऊष्म कण रोशनी के बिखरने लगे ।।

रागिनी मुस्करायी जलज खिल उठे ।
लाज से सब कुमुद सर सकुचने लगे ।।

त्याग कर नींद को जिंदगी उठ गयी ।
पंछियों के मधुर गीत सजने लगे ।।

मंद शीतल सुखद जग हवायें चलीं ।
खिलखिलायी लता फूल खिलने लगे ।।

रात मोती जो बिखरे धरा अंक में ।
छू गयी रवि किरण सब चमकने लगे ।।

धीरे-धीरे बढ़ाते हुये दिन कदम ।
साँझ की गोद में रवि सिमटने लगे ।।

आ गयी शाम श्यामल चुनर ओढ़ के ।
यामिनी नभ सितारे चहकने लगे ।।

गीत कोमल जगे जब धरा अंक में ।
सृष्टि संगीत संसार बजने लगे ।।

— कोमल मिश्रा, प्रतापगढ़

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