दहिसर से ईशानी पटैल की कविता – बेटी सी धड़कने लगी हूँ

बेटी सी धड़कने लगी हूँ

खयाल तुम्हारा रखने के लिये
खुद को मज़बूत अब करने लगी हूँ
माँ की चिंता पर मेरे चिड़ जाने पर
खुद को कमज़ोर अब समझने लगी हूँ
खाना तुम्हें भरपेट खिलाने के लिये
रोज़ नये तरीक़े जब सोचने लगी हूँ
जाऊँ कभी मायके में अब मैं
चुपचाप ख़ुद को परोसने लगी हूँ
हँसता तुम्हें हर दम देखने के लिये
परेशानी में भी खुद पागलों सी हँसने लगी हूँ
माँ के गुस्से पे रो देने पर झूठा सा
आज फ़िर बच्चों सी रोने लगी हूँ
नींद पूरी तुम्हारी करने के लिये
अब सोते हुए भी मैं जागने लगी हूँ
बनकर आई तुम जब से जिगर का टुकड़ा
दिल में तुम्हारे बेटी सी धड़कने लगी हूँ

– ईशानी पटैल
दहिसर, मुंबई

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12 Comments

  1. वाहह…. दिल की बात…दिल से दिल तक ❤️🙏✍️
    बहुत सुंदर 👌

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