महासमुंद से महेश राजा की लघुकथा – प्रॉमिस

लघुकथा-

प्रॉमिस

कुश फोन पर कह रहा था,'”दादा,आपने वादा किया था कि मेरे स्पोर्ट्स डे पर आप जरूर मेरे साथ रहेंगे।पर आप नहीं आये।मुझे फस्ट प्राईज भी मिला।जब मेरा नाम एनाऊंस हुआ,मेरी आंखे आपको ही ढूंढ रही थी।मुझे टा्फी भी मिली।पर मुझे कुछ भी अच्छा न लगा।जाईये मै आपका फ्रेंड नहीं… मै आपसे बात नहीं करता….उसने फोन रख दिया था।
उसे लगा,नाहक ही उसने बच्चे का दिल तोड दिया।अव्वल तो वादा नहीं करना था .फिर अगर किया यो उसे पूरा करना था।पर,परिस्थिति वश..।ऐसा हो न पाया।
वह सोच रहा था।जीवन मे भी हम सब यही करते है न।चाहे वह प्रेम हो या रिश्ता,भावना मे बह कर प्रामिस तो कर देते है।पर,उसे पूरा नहीं करते।
कितना गलत करते है हम सब।पोते को तो मना भी लेगा।परन्तु जीवन मे ऐसे कई पडाव आते है:जब ये प्रामिसेस टूपते है और साथ ही ढेर सारे सपनों की मौत हो जाती है।
कहने की गरज यह कि आज के इस प्रामिस डे पर हम स्वयं से प्रामिस करे कि कभी किसी से झूठा प्रामिस कभी भी नहीं करेंगे।यही इस दिन की सार्थकता कहलायेगी।

– महेश राजा
वसंत 51कालेज रोड।
महासमुंद।छत्तीसगढ़

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