बेंगलुरू से नन्द सारस्वत की कविता – ऋतुराज

बसंत का जब आगमन होता है तब वसुंधरा सर्द ऋतु से बाहर आ कर अपनी अंगड़ाई मौड़ कर ,नव यौवन से खिल उठती है ।
दादुर ,मोर,पपीहे,चकवा चकवी,तोता मैना का सरगम चमन में गुंजायमान होने लगता है,और प्रकृति अपने आल्हादों से जन जन के तन मन कोभाव विभौर कर देती है ।
हर ओर एक नयी उर्जा और नविनता का संचरण होने लगता है,आसमां से बरसती शबनम नव पल्लव पर मुक्ता सी चमकने लगती है जैसे इश्वर ने धरा पर रजत कण बिखरा दिये हो ।
नव कोंपल और रंग बिरंगे फूल जैसे किसी रंगरेज की तुलिका से बने चिरताम सा मन में अंकित हो जाता है…
पेश है आपकी खिदमत में वसंतोत्सव के आगमन पर मेरा एक प्रयास………

….ऋतुराज….
खिलता खिलाता आया देखो
मौसम का अंदाज
धरा को सुरभित करने आया
ऋतु बना ऋतुराज..

निखरा वसुंधरा का अंग
पंकज जैसे गया मिल
ठिठुरती धरा को जैसे
दिनकर गया मिल
सरगम गीतों की संग में ले के
आयी नव स्वरों का साज..
धरा को सुरभित करने आया
ऋतु बना ऋतुराज..

मौसम नभ में बदल रहा है
धरा पे ले अंगडाई..
सर्द ऋतु भी छोड़ है
अब अपनी चतुराई..
बसंत बहार भी आ कर के
कर रही नविन आगाज
धरा को सुरभित करने आया
ऋतु बदल ऋतुराज..

नव पल्लव और नव कोंपल से
मधुबन चहके सारे
गुलों से गुलशन महके महके
भौंरे बहके सारे
दादुर, मोर ,पपीहे गाये
करते मधुर आवाज ..
धरा को सुरभित करने आया
ऋतु बदल ऋतुराज..

प्राकृति आल्हादित हो कर के
गा रही मेघ मल्हार
मयुर मुदित हो कर के कुहूके
और छाई बाग बहार
सागर नदिया पर्वत महके
मरु बने है नाज
धरा को सुरभित करने आया
ऋतु बना ऋतुराज..

नन्द सारस्वत नंद बेंगलुरु
#1, गोदिवरी विला
मिनाक्षी नगर
बेंगलुरु-560079
सं

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