गया जी से अमन धीश की कविता – सरहद

सरहद

मेरे घर के सामने एक गली है
गली के सामने और भी घर है ।।

आते जाते राहगीर
दोनों ओर देखते है
और जब कोई जाना पहचाना गुजरता
राम दुआ सलाम कर देता है मुझे
सामने वाले घर मुझसे जलते है
और कभी कभी कहते है
आपको तो पूरा शहर जानता है ।।

जब कभी कोई विपदा
मेरे घर के आँगन छाई
गली सुनसान मिला
और सामने वाले घर से आवाज आई
क्या हुआ भाई
सामने से आती आवाज
परिंदो कि चू चू सी लगी
और दुख में भी
मेला हमारे घर में हर बार लगा ।।

खुशी कि घड़ी आई
उसी गली के रास्ते में
रेड कार्पेट पर
हँसता चमकता संसार दिखा ।।

और कभी कभी
वही गली जंग का मैदान दिखा
जब कोई बात बिगड़ गई
कभी मकान की छत निकल गई
कभी नाली उनके तरफ से निकल गई
या कभी बच्चे बच्चे आपस में झगड़ गए
समझ लो गली हमारी सरहद बन गई
जो समझदार है वो लाईन ओफ कंट्रोल कि बात करते है
और जो बेवफूक होते है
वो घुसपैठिया के दाव मे लगे होते है ।।

वक्त फिर बदलता है
हालात के दौर से गुजरता है
लाख गुनाह माफ करके
सामने वाले को गले से लगाता है
और समझाता है ।।

सरहद जमीन पे खिंची है
और जख्म दिल में लिए फिरता है ।।

#अनंत धीश अमन
गया जी बिहार
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