धनबाद से रिपुदमन झा पिनाकी की कविता – वसंत

वसंत
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आया ऋतुराज वसंत
लेकर सुरभित बयार
पुलकित करने, झंकृत करने
तन-मन के तारों को
किरणें झिलमिलाने लगीं
दिग दिगंत हँसने मुस्काने लगे
वन उपवन
फूलों से सुसज्जित होने लगे
पुष्प वल्लरियाँ पेड़ों पर
तोरण बन खिलने लगीं
मधुमास मन की तृष्णा मिटा रही है
मादक तरुणाई इठलाई है
मौसम ने ली अंगड़ाई है
हरी धरती लहराने लगी है
हरितिमा दुशाला बन बिछ गई खेतों में
आम्र मंजरी की मादक महक
मतवाला कर रही है प्रकृति को
बागों में कोयल की मधुर कूक
भृंगों के मधुरम गुंजन
रति विरह व्यथा का अंत करने लगी।

रिपुदमन झा “पिनाकी”
धनबाद (झारखण्ड)
#स्वरचित

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