भोपाल, मध्यप्रदेश से अशोक व्यास का व्यंगय आलेख – टाइम नही है

टाइम नहीं है
व्‍यंग्‍य – अशोक व्‍यास

अंग्रेजी भाषा के कुछ प्रसिद्ध शब्‍द हैं जैसे सॉरी, थेंक्‍यू या अंग्रेजी और हिन्‍दी के कुछ मिल-जुल कर बनाये गये शब्‍द हैं, जैसे बोर हो गये हैं, मूड खराब है या टाइम नहीं है । इन सबमें आजकल टाइम नहीं का चलन बहुत हो गया है । वैसे हम लोगों के पास टाइम की कमी नहीं रहती है, परन्‍तु यह ऐसा मुंह लगा वाक्‍य है जो कि वक्‍त-बेवक्‍त मुंह से निकल ही जाता है ।
आज सुबह-सुबह की बात है आफिस जाने के लिये तैयार हो रहा था कि हमारे पडोसी फुरसती लाल जी आ गये । उनके पास हमेशा फुर्सत रहती है और रोना रोते रहते हैं कि काम के मारे फुर्सत ही नहीं मिलती, टाइम नहीं मिलता । आते ही कहने लगे, “यार मेरी गाडी में पेट्रोल नहीं आज तुम्‍हारे साथ ही आफिस चलूंगा” । क्‍या करूं पेट्रोल डलवाने का टाइम ही नहीं मिला, मैंने कहा, “कोई बात नहीं आखिर पडोसी किसलिये होते हैं” । अब उनका भाषण शुरू हो गया, “इस मंहगाई में तो आम आदमी का जीना दूभर हो गया है । देखिये पेट्रोल के भाव कितने बढ गये हैं । आपको क्‍या लगता है यह सरकार कब तक चलेगी ? इस देश का भविष्‍य क्‍या होगा” । अब मैं उन्‍हें क्‍या जवाब देता आफिस में देर से पहुंचने पर मेरा भविष्‍य खराब होने की संभावना नजर आ रही थी । फिर भी टालने के लिये जैसे कि हर बुद्धिजीवी की आदत होती है वह अपने प्राचीन गौरवपूर्ण अतीत के बीहडों में भटकने लगता है, मैंने कहा “हमारा इतना प्राचीन देश है इसने कई संकटों पर विजय पाई है और आज भी हर संकट का मुकाबला करने में सक्षम है । आप चिन्‍ता न करें इस देश का भविष्‍य बहुज उज्‍जवल है” ।
खैर, जैसे-तैसे उनको बाइक पर बिठा कर आफिस देर से पहुंचा । अब बॉस को सॉरी बोलना पडेगा । मैं जल्‍दी-जल्‍दी आफिस का कार्य निपटा रहा था कि मेरे सामने उधार चंद जी उर्फ यू.सी. रूकावट के लिये खेद की तरह चेहरा लटकाये नजर आये । मुझे याद आया आज उधार चन्‍द जी ने मेरे रूपये लौटाने का वादा किया था । उन्‍होंने रूपये नहीं लौटाये तो श्रीमतिजी का गुस्‍से के तेवर से सजे जेवर सा सूजा हुआ मुंह देखना पडेगा ।
उन्‍होंने बहाने बनाने का अखिल भारतीय प्रदर्शन करते हुए कहा क्‍या करूं बंधु, (बंधु उनका प्रिय संबोधन था) कल टाइम ही नहीं मिला इसलिये ए.टी.एम. नहीं जा सका । आप तो जानते ही हैं आजकल बैंकों में जब देखो तब हडताल हो जाती है । बंधु कुछ भी कहो इन बैंक वालों के बहुत मजे हैं, सबसे ज्‍यादा वेतन लेते हैं और काम करने में ग्राहक को परेशान करते हैं । पिछले माह की बात है मुझे नई पास बुक लेनी थी परन्‍तु चार चक्‍कर लगाने के बाद मिली । बंधु आप यह बात लिख लीजिये “अगर इसी तरह चलता रहा तो हमारे देश में भी बैंकों का निजीकरण हो जायेगा” । इस तरह रूपयों की बात छोडकर टी..वी. चेनलों की तरह असली बात कम और विज्ञापनबाजी ज्‍यादा करते रहे । मैं समझ गया वह मेरी उम्‍मीद पर आज भी हमेशा की तरह खरे नहीं उतरने वाले थे ।
इस देश में टाइम नहीं है का शोर चारों तरफ फैल रहा है इसके प्रदूषण से जीवन का हर क्षेत्र प्रदूषित हो गया है । ईसाई धर्म ग्रन्‍थों में लिखा है कि ईश्‍वर ने छ: दिन तक इस संसार को बनाया और सातवें दिन आराम किया । हिंदू दर्शन में इस तरह की कोई बंदिश नहीं है इसलिये हम पूरे 365 दिन आराम करते हुये बडी अदा से कह देते हैं कि टाइम नहीं है । भारत के आम आदमी से लेकर वी.आई.पी. तक टाइम की कमी से परेशान हैं । नेता के पास जनता के लिये टाइम नहीं है, मंत्री के पास कार्यकर्ता के लिये टाइम नहीं है, कर्मचारी के पास काम करने का टाइम नहीं है, मां-बाप के पास बच्‍चों के लिये और बच्‍चों के पास मां-बाप के लिये टाइम नहीं है । शिक्षक के पास पढाने का और छात्रों के पास पढने का टाइम नहीं हैं । यह बीमारी दोस्‍तों, रिश्‍तेदारों और घर-घर में फैल गई है । कुछ दिन पहले की बात है एक मित्र जो दिखाई ज्‍यादा देते थे परन्‍तु उनके पास मिलने का समय नहीं था, भूल से रास्‍ते में टकरा गये, मैंने उनसे शिकायत की “क्‍या बात है
यार तुम तो हमारे जनप्रतिनिधि की तरह दुर्लभ हो गये, मिलते ही नहीं” । “क्‍या करूं यार टाइम ही नहीं मिलता है” । जबकि उनको कई बार मैंने चाय-पान की दुकान पर घंटों गप्‍पे मारते देखा था ।
सर दर्द होने के कारण आज मैं जल्‍दी घर गया तो देखा श्रीमतिजी प्रत्‍येक भारतीय स्‍त्री की तरह पति के काम पर जाने के बाद का समय पडोसन से गप्‍पे लगाने में बिताते हुए अपना पत्नि धर्म निभा रहीं थीं । मैं अंदर जाकर सोफे पर बैठ गया पत्नि अपनी सहेली के साथ दरवाजे पर खडी हुई अडोस-पडोस से लेकर देश-विदेश तक की समस्‍याओं पर चर्चा करने में व्‍यस्त थीं । आधा घंटा हो गया परन्‍तु सहेली जाने का नाम ही नहीं ले रही थी, अंत में श्रीमतिजी को कहना पडा, “बहिनजी अंदर आ जाइये” बहिनजी ने तुरन्‍त उत्‍तर दिया, “क्‍या करें बहिनजी आज तो बात करने का भी टाइम नहीं है, इतना काम है बच्‍चों का, घर का, और हमारी सास के स्‍वभाव को तो आप जानती ही हैं, दो घडी बात करने लग जाओ तो इतनी बात सुनातीं हैं कि कान पक जाते हैं ” । इस तरह पंद्रह मिनिट का समय सासू पुराण सुनाने के बाद उन्‍होंने प्रस्‍थान किया ।
अंदर आकर उन्‍होंने चाय बनाकर मुझे लाकर दी और पूंछने लगीं, “आपके मित्र ने रूपये लौटा दिेये क्‍या ? बाजार जाना है, सब्‍जी वगैरह लानी है फ्रिज भी खाली हो गया है” । तब तक मेरे सर में भी दर्द की जगह टाइम नहीं का भूत सवार हो गया था । झल्‍लाते हुए मैंने कहा, अभी टाइम नहीं है, बाजार कल जाऊंगा ।

– भोपाल, मध्यप्रदेश।

Please follow and like us:
0

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*